Wednesday, April 29, 2026
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कोल्हापुरी चप्पल को मिला वैश्विक मंच: ‘मेड इन इंडिया’ की ताकत दुनिया के सामने: मुख्यमंत्री फडणवीस

मुंबई। महाराष्ट्र की पारंपरिक चर्मकला का प्रतीक ‘कोल्हापुरी चप्पल’ अब वैश्विक लक्ज़री उत्पाद के रूप में अपनी पहचान बना रही है। मंगलवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि महाराष्ट्र के कारीगरों की सृजनशीलता ने ‘मेड इन इंडिया’ की ताकत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी ढंग से स्थापित किया है। भारतीय पारंपरिक कला को वैश्विक पहचान दिलाने के उद्देश्य से प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय ब्रांड प्राडा और लिडकॉम (संत रोहिदास चर्मउद्योग) के बीच महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इस करार के तहत आने वाले तीन वर्षों तक कारीगरों के कौशल विकास के लिए प्राडा पूरी तरह वित्तीय सहयोग प्रदान करेगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (NIFT) और कर्नाटक इंस्टीट्यूट ऑफ लेदर एंड फैशन टेक्नोलॉजी (KILFT) में संचालित किए जाएंगे, जिससे महाराष्ट्र और कर्नाटक के पारंपरिक कारीगरों को आधुनिक डिजाइन और तकनीकी दक्षता से जोड़ा जाएगा। इस साझेदारी के माध्यम से लगभग 300 कारीगरों को प्रशिक्षित किया जाएगा, जिनमें से 30 उत्कृष्ट कारीगरों को इटली स्थित प्राडा अकादमी में उन्नत प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा। प्रशिक्षण में डिजाइन, डिजिटल टूल्स, बाजार के रुझान और आधुनिक तकनीकों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, ताकि पारंपरिक कला को वैश्विक बाजार के अनुरूप विकसित किया जा सके। सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट ने कहा कि यह करार केवल कारीगरों के श्रम को सम्मान देने वाला नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर स्थापित करने वाला कदम है। वहीं, राज्यमंत्री माधुरी मिसाळ ने इस पहल के सफल समन्वय के लिए लिडकॉम की सराहना की। विभाग के प्रधान सचिव डॉ. हर्षदीप कांबळे ने बताया कि यह समझौता अंतरराष्ट्रीय कानूनों और बौद्धिक संपदा अधिकारों को ध्यान में रखते हुए किया गया है, जिससे कारीगरों के पारंपरिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे। लिडकॉम की प्रबंध निदेशक प्रेरणा देशभ्रतार ने इसे भारतीय हस्तकला के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया। गौरतलब है कि लिडकॉम पिछले पांच दशकों से महाराष्ट्र के चर्मकार समुदाय के सशक्तिकरण और पारंपरिक कला के संरक्षण के लिए कार्यरत है। वर्ष 2009 में कोल्हापुरी चप्पल को भौगोलिक संकेतक (GI) दर्जा दिलाने में भी संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस पहल से न केवल कारीगरों को वैश्विक अवसर मिलेंगे, बल्कि सदियों पुरानी भारतीय परंपरा को नई पहचान और आर्थिक मजबूती भी प्राप्त होगी।

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