तीन माह में छह बार नगर भ्रमण पर निकलेंगे बाबा महाकाल, दशहरे पर करेंगे शमी पूजन
वैकुंठ चतुर्दशी पर गोपाल मंदिर में होगा हरि-हर मिलन, कार्तिक-अगहन की सवारियों में शिप्रा तट पर निभाई जाएगी तीर्थपूजन की परंपरा

उज्जैन, मध्य प्रदेश। ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर की समृद्ध पूजन परंपरा में आने वाले तीन महीने विशेष रहने वाले हैं। अश्विन से मार्गशीर्ष तक भगवान महाकाल छह बार चांदी की पालकी में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलेंगे। विजयादशमी पर अवंतिकानाथ राजा के रूप में दशहरा मैदान पहुंचकर शमी वृक्ष का पूजन करेंगे, जबकि वैकुंठ चतुर्दशी पर भगवान महाकाल श्रीहरि विष्णु से मिलने गोपाल मंदिर जाएंगे। महाकाल मंदिर की पूजन परंपरा में श्रावण-भाद्रपद की सवारियां सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं, लेकिन भगवान महाकाल का नगर भ्रमण केवल इन दो महीनों तक सीमित नहीं है। विजयादशमी के साथ कार्तिक और अगहन मास में भी विशेष पर्वों पर भगवान महाकाल की सवारी निकलती है। इस बार अश्विन से मार्गशीर्ष तक इन परंपराओं के छह अवसर आएंगे। इनमें 20 अक्टूबर को विजयादशमी की सवारी विशेष रहेगी। इस दिन भगवान महाकाल वर्ष में एक बार फ्रीगंज क्षेत्र में प्रवेश करते हुए दशहरा मैदान पहुंचेंगे। यहां अवंतिकानाथ शमी वृक्ष का पूजन करेंगे। भगवान महाकाल को उज्जैन का अधिपति और राजा मानने की परंपरा में विजयादशमी का यह पूजन राजधर्म और लोकमंगल की भावना से जुड़ा माना जाता है। कार्तिक मास में 23 नवंबर की रात वैकुंठ चतुर्दशी पर भगवान महाकाल की सवारी गोपाल मंदिर पहुंचेगी। यहां रात 12 बजे हरि-हर मिलन की परंपरा निभाई जाएगी। मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु सृष्टि का भार भगवान शिव को सौंपकर राजा बलि के यहां पाताल लोक चले जाते हैं। देवप्रबोधिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने और वैकुंठ लौटने के बाद वैकुंठ चतुर्दशी पर भगवान महाकाल उन्हें सृष्टि का भार पुनः सौंपने जाते हैं। गोपाल मंदिर में हरि-हर मिलन इसी धार्मिक प्रसंग को जीवंत करता है। कार्तिक और अगहन मास की सवारियों में भगवान महाकाल शिप्रा तट पर तीर्थपूजन की परंपरा भी निभाएंगे। सनातन परंपरा में इन महीनों को स्नान, दान और तीर्थपूजन के लिए विशेष माना गया है। उज्जैन के राजा के रूप में भगवान महाकाल स्वयं शिप्रा तट पहुंचकर प्रजाजनों के साथ तीर्थपूजन करते हैं। भगवान महाकाल की इन सवारियों से पहले 12 अक्टूबर को अश्विन शुक्ल द्वितीया पर उमा माता की सवारी निकलेगी। माता उमा चांदी की पालकी में सवार होकर रामघाट पहुंचेंगी, जहां उमा-सांझी उत्सव के समापन पर शिप्रा नदी में सांझी का विसर्जन किया जाएगा। महाकाल मंदिर की परंपरा में माता पार्वती की यह सवारी वर्ष में केवल एक बार निकलती है। इस दौरान भगवान महाकाल भी नंदी पर मनमहेश स्वरूप में सवार होकर नगर भ्रमण करेंगे।
