कैंसर की दवा या मरीज की मजबूरी?

हेमेन्द्र क्षीरसागर
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में मरीज पहले ही शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजरता है। ऐसे में जीवनरक्षक दवाओं की कीमत यदि उसकी आर्थिक क्षमता से बाहर हो जाए, तो यह केवल बाजार का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और मानवीय संवेदना का प्रश्न बन जाता है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि लगभग 2,700 में उपलब्ध कैंसर की एक दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य 27,000 क्यों है? अदालत ने दवाओं के विक्रय मूल्य और व्यापारिक लाभांश को अधिक तर्कसंगत बनाने की जरूरत पर भी सवाल उठाया। हालांकि, 16 प्रतिशत की सीमा को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। बदतर, कैंसर अब केवल किसी एक वर्ग या आयु समूह की बीमारी नहीं रह गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान संस्था के वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार भारत में उस वर्ष अनुमानित 14 लाख 13 हजार नए कैंसर रोगी सामने आए और लगभग 9 लाख 17 हजार लोगों की मृत्यु कैंसर से हुई। पांच वर्षों में कैंसर से प्रभावित लोगों की अनुमानित संख्या 32 लाख 58 हजार से अधिक थी। इन आंकड़ों को देखते हुए कैंसर के उपचार को केवल चिकित्सा का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। उपचार की सुलभता और सहजता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वहीं भारत में आवश्यक दवाओं की कीमत नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण कार्य करता है। वर्ष 2019 में 42 कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक लाभांश को तर्कसंगत बनाने की व्यवस्था लागू की गई थी। हालांकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार इससे कुछ दवाओं की कीमतों में 90 प्रतिशत तक कमी आई। लिहाजा, समस्या केवल दवा की कीमत तक सीमित नहीं है। निर्माता से लेकर थोक विक्रेता, खुदरा विक्रेता और अस्पताल तक पूरी मूल्य श्रृंखला में पारदर्शिता जरूरी है। मरीज को यह पता होना चाहिए कि दवा की वास्तविक कीमत क्या है और उस पर कितना लाभ जोड़ा गया है। इसके लिए जीवनरक्षक दवाओं की नियमित मूल्य समीक्षा, अस्पतालों की औषधि दुकानों में पारदर्शिता, सस्ती गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता और दवा की पूरी मूल्य श्रृंखला की निगरानी आवश्यक है। बदस्तूर कैंसर के उपचार में केवल दवा ही खर्च नहीं होती। जांच, चिकित्सकीय परामर्श, शल्य चिकित्सा, विकिरण उपचार, अस्पताल में भर्ती और आने-जाने का खर्च भी जुड़ता है। दवा की कीमत में अनावश्यक वृद्धि इस पूरे आर्थिक बोझ को और बढ़ा देती है। परिणामस्वरूप कई परिवार बचत समाप्त होने, ऋण लेने या संपत्ति बेचने तक की स्थिति में पहुंच सकते हैं। वस्तुत: दवा उद्योग को उचित लाभ मिले, लेकिन मरीज की मजबूरी को अत्यधिक लाभ का आधार नहीं बनाया जा सकता। कैंसर से लड़ रहे व्यक्ति को बीमारी के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए, दवा की कीमत के विरुद्ध नहीं। स्वास्थ्य सेवा में व्यापार हो सकता है, लेकिन मानवीय संवेदना की कीमत तय नहीं होनी चाहिए।
