भगत सिंह को याद करते हुए!

प्रिय भगत!
दस दिन पहले जलाए
सरकारी दियों के
बुझ जाने के
बुहार कर
कचरे के ढेर पर
फेंक दिए जाने के बाद
बिना दिये जलाए
हम तुम्हें याद कर रहे हैं
क्योंकि तुम्हारी जलाई लौ
भले टिमटिमा रही हो
पर अब भी जल रही है
करोड़ों दिलों के भीतर
बिना किसी
सरकारी फ़रमान के
प्यारे भगत!
आज बड़ी शर्मिंदगी से
हम तुम्हें याद कर रहे हैं
जिस भारतमाता की
आज़ादी के लिए
हॅंसते हुए तुम
और तुम्हारे साथियों ने
अपनी आहुति दे दी
हम सबकी वह माॅं
लोकतंत्र के जादू से
दलालों के बीच फॅंस गई है
वे उसे घसीट कर
उसी तरह घसीट कर
जैसे
द्रौपदी को लाया गया था
द्यूत सभा के बीच
ठीक वैसे ही
बाज़ार में ले आए हैं
उसके आंचल
उसके जिस्म
उसके बच्चों को
नीलाम किया जा रहा है
भगत!
और हम कुछ भी नहीं
कर पा रहे हैं
ज़िंदा रहने की लत ने
हमें नपुंसक
और नाकारा बना दिया है
आज हमारे चारों ओर
नए तरह का
जलियाॅंवाला नरसंहार
अनवरत हो रहा है
जनरल डायर
राष्ट्रवाद के ज्ञान का
वमन कर रहा है
तुम्हारे
हमारे
समाजवाद के
चिथड़े उड़ाए जा रहे हैं
पाप की गोद में बैठा
नगरसेठ आसमान की
ऊॅंचाइयों पर
और हमारा मुल्क
पाताल की गहराइयों में
धॅंसता चला जा रहा है
हममें
इतना सामर्थ्य
नहीं बचा
कि वाराह की तरह
इस कीच में धॅंसकर
अपनी धरती को
बचा सकें
हमें कीचड़ से
डर लगता है
यूॅं तो
छिटपुट कोशिशें
चल ही रही हैं
पर इस बार
दैत्यों ने
रामनामी ओढ़ ली है
काले चेहरे को
तिरंगे से रॅंग लिया है
इसलिए
भोली-भाली
और एक हद तक
मूर्ख प्रजा
उन्हें ठीक से
पहचान नहीं पा रही है
इस बार हम
पहले से भी
भयानक गुलामी के
शिकंजे में फॅंस गए हैं
शहीदे आज़म!
हत्यारे
अंधेरी गलियों से नहीं
मंदिरों के उजाले से
बड़े हुजूम में निकल रहे हैं
उनके होंठों पर राष्ट्रगान
और हाथों में
धारदार छुरे हैं
ख़ूॅंख़्वार आंखों के
जंगल में
नफ़रत की आग
धधक रही है
अब तुम ही राह दिखाओ
हमारे मसीहा!
हमें अब कुछ भी
सूझ नहीं रहा है
हमें जैसे अग्नि दी है
वैसे ही दिशा भी दो !
हम चिलचिलाती
रौशनी में
चौंधियाए
भटक रहे हैं !
यह अंधेरे का
नया रूप है।
-हूबनाथ
