संपादकीय: चुनाव आयोग के सामने भरोसे की चुनौती

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती केवल समय पर चुनाव कराने से नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया पर नागरिकों के भरोसे से भी तय होती है। इसी कारण चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से निष्पक्षता के साथ-साथ पारदर्शिता की अपेक्षा भी स्वाभाविक है। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बाद विपक्ष ने आयोग के कामकाज पर लगातार सवाल उठाए हैं। चुनाव हारने वाले राजनीतिक दलों द्वारा आयोग की आलोचना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़े घटनाक्रम ने बहस को नया आधार दिया है। हाल में इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आयोग से जुड़े विभिन्न निर्णयों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, फॉर्म-6 से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा और मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण जैसे विषय शामिल थे। हालांकि चुनाव आयोग का पक्ष है कि वैधानिक निर्णय तीनों सदस्यों की सहमति से लिए गए और फॉर्म-6 में बदलाव नहीं किया गया, बल्कि एसआईआर से संबंधित एक अलग घोषणा जोड़ी गई थी।
लोकतांत्रिक संस्था के भीतर अलग-अलग विचार होना अपने आप में असामान्य नहीं है। बल्कि महत्वपूर्ण मामलों पर विमर्श किसी संस्था की निर्णय प्रक्रिया को अधिक मजबूत बना सकता है। चिंता तब पैदा होती है जब मतदाता के अधिकार से सीधे जुड़े फैसलों की प्रक्रिया और उनके कानूनी आधार को लेकर आयोग के सदस्यों के बीच ही सवाल उठें। ऐसे मामलों में अस्पष्टता के बजाय अधिक पारदर्शिता ही संस्था की विश्वसनीयता मजबूत कर सकती है। विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू फॉर्म-6 से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक एसआईआर के दौरान नए मतदाताओं से यह बताने वाली अतिरिक्त घोषणा मांगी गई कि उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं। चुनाव आयुक्तों की आपत्ति इस बात पर थी कि वैधानिक फॉर्म से जुड़ी ऐसी आवश्यकता को किस प्रक्रिया के तहत लागू किया गया। चुनाव आयोग ने बाद में स्पष्ट किया कि मूल फॉर्म-6 में परिवर्तन नहीं किया गया और संबंधित जानकारी अलग घोषणा के माध्यम से मांगी गई। लेकिन तकनीकी और कानूनी बहस से अलग आम मतदाता की व्यावहारिक परेशानी को भी समझना जरूरी है। दशकों पुरानी मतदाता सूची में अपने माता-पिता या परिवार के दूसरे सदस्यों की जानकारी तलाशना हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं है। प्रवासी मजदूरों, किराये के मकानों में रहने वाले परिवारों, बुजुर्गों और बार-बार स्थान बदलने वाले नागरिकों के लिए यह काम और कठिन हो सकता है। चुनाव सुधार की कोई भी प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें पात्र मतदाता के लिए पंजीकरण आसान हो, न कि अनावश्यक रूप से जटिल। एसआईआर का मूल उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध बनाना है। मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, दोहराव वाली अथवा अन्य अपात्र प्रविष्टियों को सूची से हटाना निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है। लेकिन इसी के साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से न हटे। मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं हैं; दोनों को साथ लेकर चलना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़ी बड़ी संख्या में अपीलों ने इसी चुनौती को सामने रखा है। हाल की अदालती कार्यवाही में लाखों लंबित अपीलों और उनके निस्तारण की गति को लेकर सवाल सामने आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार मौजूदा गति से मामलों के निपटारे में वर्षों लगने की आशंका जताई गई, जिसके बाद अधिक ट्रिब्यूनल की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई है। वहीं चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि जिन मामलों में अपीलों पर फैसला हो चुका है, उनमें बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम वापस बहाल किए गए हैं। यह तथ्य दो बातें रेखांकित करता है—अपील की व्यवस्था महत्वपूर्ण है और प्रारंभिक स्तर पर हुई संभावित त्रुटियों को शीघ्र सुधारने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है। मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटना सामान्य प्रशासनिक घटना नहीं है। यदि कोई पात्र नागरिक चुनाव के दिन मतदान नहीं कर पाता तो बाद में नाम बहाल हो जाने पर भी उस चुनाव में उसके खोए हुए मताधिकार की भरपाई नहीं हो सकती। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया में सूचना, सुनवाई और अपील का अधिकार व्यावहारिक रूप से प्रभावी होना चाहिए।
चुनाव आयोग को इस पूरे विवाद को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित मानकर नहीं देखना चाहिए। विपक्ष के आरोपों की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि हो सकती है और आयोग का अपना स्पष्टीकरण है। लेकिन संस्था के भीतर दर्ज आपत्तियों और मतदाता सूची से जुड़े इतने व्यापक प्रश्नों का उत्तर दस्तावेजों, स्पष्ट नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से देना ही सबसे प्रभावी रास्ता होगा। आयोग चाहे तो महत्वपूर्ण निर्णयों के आधार, प्रक्रियागत बदलाव और मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के मानदंडों के बारे में अधिक जानकारी सार्वजनिक कर सकता है। इससे न केवल राजनीतिक विवादों को तथ्यों की कसौटी पर परखा जा सकेगा, बल्कि आम नागरिक को भी यह समझने में आसानी होगी कि उसके मताधिकार से जुड़े निर्णय किस आधार पर लिए जा रहे हैं। चुनाव आयोग की जवाबदेही किसी सरकार या विपक्ष के प्रति नहीं, बल्कि संविधान और देश के मतदाताओं के प्रति है। इसी कारण उसकी निष्पक्षता जितनी महत्वपूर्ण है, निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नागरिकों को यह भरोसा होना चाहिए कि मतदाता सूची में उनका नाम किसी तकनीकी त्रुटि या अस्पष्ट प्रक्रिया के कारण प्रभावित नहीं होगा और यदि गलती होती भी है तो उसका समाधान तेजी से मिलेगा। भारत के चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी उसकी संस्थागत विश्वसनीयता है। एसआईआर को लेकर उठे सवालों और आयोग के भीतर सामने आई आपत्तियों का सबसे मजबूत जवाब आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि अधिक पारदर्शिता, स्पष्ट प्रक्रिया और त्वरित सुधार हो सकता है। लोकतंत्र में प्रत्येक पात्र मतदाता का वोट समान मूल्य रखता है और चुनावी व्यवस्था की अंतिम कसौटी यही है कि उस अधिकार की रक्षा कितनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता से की जाती है।

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