संपादकीय: हिमालय की बढ़ती बेचैनी

हिमालय को अक्सर भारत और दक्षिण एशिया का प्राकृतिक सुरक्षा कवच और जल भंडार कहा जाता है, लेकिन अब यही हिमालय गंभीर पर्यावरणीय संकट के संकेत दे रहा है। एक नई रिसर्च में सामने आई तस्वीर चिंताजनक है। ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, उनसे बनने वाली झीलों का आकार और जोखिम बढ़ रहा है तथा ऊंचे पहाड़ों की ढलानें अस्थिर होती जा रही हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि जिस गति से हिमालय का प्राकृतिक स्वरूप बदल रहा है, उस अनुपात में वैज्ञानिक निगरानी और आपदा से निपटने की तैयारी पर्याप्त नहीं दिखाई देती। हाल में नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ ने इस खतरे को और गंभीरता से सामने रखा है। पानी और मलबे के अचानक आए सैलाब ने जान-माल के साथ सड़कों, पुलों और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। हिमालयी क्षेत्र में ऐसी घटनाओं को अब केवल अलग-अलग प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक और बदलते जोखिम के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। ग्लोबल कंसल्टेंसी कंपनी सिस्टमिक की रिपोर्ट के मुताबिक हिमालयी ग्लेशियरों की बर्फ एक दशक पहले के मुकाबले अब 65 प्रतिशत अधिक तेजी से कम हो रही है। हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में करीब 40 हजार ग्लेशियर होने का अनुमान है, लेकिन इनमें से बहुत कम की लगातार और विस्तृत निगरानी हो रही है। यदि निगरानी से संबंधित यह अंतर बना रहता है तो भविष्य के खतरे का समय रहते अनुमान लगाना कठिन हो सकता है। भारत के लिए यह चिंता और बड़ी है। देश की करीब 18 प्रतिशत भूमि हिमालयी क्षेत्र में बताई जाती है, जबकि प्राकृतिक आपदाओं का बड़ा हिस्सा इसी संवेदनशील क्षेत्र से जुड़ा है। सरकार के अनुसार भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 189 अधिक जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक आकलन किया गया और इनमें 56 को बहुत अधिक खतरे वाली श्रेणी में रखा गया। केंद्रीय जल आयोग हिमालयी नदी घाटियों में मौजूद हजारों ग्लेशियर झीलों की निगरानी कर रहा है। यह प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बदलती परिस्थितियों को देखते हुए निगरानी के दायरे और उसकी तकनीकी क्षमता को लगातार बढ़ाना होगा।
भारत पहले भी हिमालय के रौद्र रूप की कीमत चुका चुका है। वर्ष 2023 में सिक्किम की तीस्ता घाटी में ग्लेशियर झील से जुड़ी विनाशकारी बाढ़ ने बड़ी संख्या में लोगों की जान ली और सड़कों, पुलों तथा जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाया। इससे पहले वर्ष 2021 में उत्तराखंड की ऋषिगंगा-धौलीगंगा घाटी की आपदा में भी भारी जनहानि हुई थी। वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी की स्मृतियां तो आज भी देश के मानस में जीवित हैं। ये घटनाएं बताती हैं कि हिमालय में होने वाला अचानक प्राकृतिक परिवर्तन कुछ ही समय में नीचे बसे क्षेत्रों के लिए भयावह संकट बन सकता है। लेकिन खतरा केवल अचानक आने वाली बाढ़ या ग्लेशियर झील के फटने तक सीमित नहीं है। हिमालय वास्तव में दक्षिण एशिया की विशाल जल व्यवस्था है। यहां से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों के पीने के पानी, खेती, उद्योग और बिजली उत्पादन का आधार हैं। हिंदूकुश-हिमालय की कई नदी घाटियों में इस सदी के मध्य तक ‘पीक वॉटर’ जैसी स्थिति आने की आशंका जताई जा रही है। इसका अर्थ है कि ग्लेशियर पिघलने से नदियों में मिलने वाला पानी पहले बढ़ेगा, लेकिन बर्फ का भंडार घटने के बाद लंबे समय में जल उपलब्धता कम होने का खतरा पैदा हो सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था का भी हिमालयी जल व्यवस्था से गहरा रिश्ता है। कृषि, विशेषकर गेहूं और चावल जैसी फसलें, पनबिजली परियोजनाएं और पहाड़ी पर्यटन इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। इसलिए हिमालय का संकट केवल पर्यावरण या पहाड़ी राज्यों की समस्या नहीं है। इसका असर मैदानी क्षेत्रों की खेती, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और करोड़ों लोगों की आजीविका तक पहुंच सकता है। ग्लेशियरों के पिघलने के पीछे वैश्विक तापमान वृद्धि की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन कुछ ऐसे कारण भी हैं जिन पर भारत और उसके पड़ोसी देश सीधे कार्रवाई कर सकते हैं। इनमें ब्लैक कार्बन प्रदूषण प्रमुख है। ईंट भट्ठों, डीजल वाहनों, उद्योगों और अधूरे दहन से निकलने वाली कालिख जब हिमालय की बर्फ पर जमती है तो उसकी सूर्य की गर्मी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है। इससे बर्फ तेजी से पिघल सकती है। इसलिए हिमालय को बचाने की रणनीति केवल अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं तक सीमित नहीं रह सकती। मैदानी क्षेत्रों के प्रदूषण को नियंत्रित करना भी उतना ही जरूरी है। दूसरी बड़ी चुनौती हिमालय में बढ़ता निर्माण और पर्यटन है। पर्यटन पहाड़ी राज्यों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन पर्यटकों की संख्या बढ़ाना ही विकास की एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती। पहाड़ों की वहन क्षमता, पानी की उपलब्धता, कचरा प्रबंधन, यातायात और निर्माण के दबाव को ध्यान में रखकर पर्यटन नीति बनानी होगी। स्थानीय लोगों को पर्यटन से आर्थिक लाभ मिले और उसका एक हिस्सा पर्यावरण संरक्षण तथा आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे पर खर्च हो, ऐसी व्यवस्था अधिक टिकाऊ साबित हो सकती है। सबसे अधिक आवश्यकता प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली की है। ग्लेशियर झीलों, पर्माफ्रॉस्ट, संवेदनशील ढलानों और नदियों की लगातार निगरानी के लिए उपग्रह, सेंसर और स्वचालित मौसम केंद्रों का व्यापक नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। केवल खतरे की पहचान पर्याप्त नहीं है। सूचना कुछ ही मिनटों में नीचे बसे गांवों तक पहुंचनी चाहिए और लोगों को पहले से मालूम होना चाहिए कि चेतावनी मिलने पर उन्हें किस रास्ते से सुरक्षित स्थान तक जाना है।
हिमालयी संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी है। हिमालय से निकलने वाली नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं। चीन, नेपाल, भारत, भूटान और अन्य संबंधित देशों में किसी ऊंचे क्षेत्र में होने वाला प्राकृतिक बदलाव नीचे दूसरे देश के लिए आपदा बन सकता है। इसलिए ग्लेशियरों, झीलों, नदियों, भूस्खलन और मौसम से संबंधित आंकड़ों का समय पर आदान-प्रदान आवश्यक है। प्राकृतिक आपदा के मामले में सूचनाओं को कूटनीतिक सीमाओं में बांधना अंततः मानव जीवन को खतरे में डाल सकता है। नई रिसर्च की चेतावनी को भय पैदा करने के बजाय तैयारी बढ़ाने के अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए। ग्लेशियरों की वैज्ञानिक निगरानी बढ़ाना, ब्लैक कार्बन उत्सर्जन घटाना, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करना, टिकाऊ पर्यटन विकसित करना और मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बनते जा रहे हैं। हिमालय केवल बर्फ और पहाड़ों का विस्तार नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जल, खाद्य, ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा का आधार है। उसके ग्लेशियरों में होने वाला बदलाव अंततः मैदानों तक पहुंचेगा। इसलिए हिमालय की चेतावनी को केवल पहाड़ों की समस्या समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए। आज वैज्ञानिक निगरानी और दूरदर्शी नीति पर किया गया निवेश भविष्य में हजारों जिंदगियां और अरबों रुपये की संपत्ति बचा सकता है। हिमालय संकेत दे रहा है—अब जरूरत उन संकेतों को समय रहते समझने और उन पर ठोस कार्रवाई करने की है।

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