Wednesday, March 11, 2026
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त्याग,बलिदान,बहादुरी और बुद्धि कौशल की अद्भुत मिसाल- चंद्रशेखर आजाद

डॉ.मनमोहन सिंह
आदर्श चरित्र, त्याग, बलिदान, चतुराई, अपूर्व बुद्धि कौशल और बहादुरी की अनुपम मिसाल अमर शहीद चंद्र शेखर आजाद का मानना था कि ब्रिटिश हाकिमों के दमन और आतंकवाद का उत्तर पिस्तौल, बंदूक, तोप के गोलों और बमों के धमाकों से ही दिया जा सकता हैं। उनका मानना था कि देश में समाजवाद लाने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को रोकने के लिये एक बड़ी क्रांति की आवश्यकता हैं और इस बलिवेदी पर कुछ लोगों का कुर्बान होना जरूरी भी हैं। शहीद चंद्रशेखर आजाद ने अपने सैकड़ों क्रांतिकारियों के साथ इस क्रांति की बलिवेदी पर अपनी जान तो कुर्बान कर दी पर आज भी मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण जारी हैं। तब एक बार फिर आवश्यकता हैं चंद्रशेखर आजाद जैसे नवयुवकों की जो अपने आपको देश के लिए समर्पित कर सकें। गरीब जनता की आर्थिक व राजनीतिक आजादी के लिए चन्द्रशेखर आजाद के दिल में जो प्यार व कसक थी वह उन्हें अपने गांव, घर व सामाजिक वातावरण से प्राप्त हुई थी। उनके पिता पंडित सीताराम केसरी, उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे, वे अपने रोजगार के लिए अपने गांव को छोड़कर मध्य भारत की झाबुआ रियासत के भाभरा गांव में रहने लगे थे। वे बहुत की कम तनख्वाह पर कार्य करते थे। यही पर ही क्रांतिकारी चन्द्रशेखर का 23 जुलाई 1906 को जन्म हुआ था।
घर में गरीबी के कारण चंद्रशेखर आजाद लगातार विद्या प्राप्त नहीं कर सके। उनके पिता जी का स्वभाव बहुत सख्त था। अपने पिता के स्वभाव के कारण वे बंबई चले गए थे। वहां पर उन्होंने कुछ समय तक एक कंपनी में नौकरी भी की। उसके बाद वे बम्बई से काशी पहुंचे जहां वे संस्कृत की शिक्षा लेने लगे। जब महात्मा गांधी ने देश की आजादी के लिए असहयोग आन्दोलन चलाया तो चन्द्रशेखर आजाद बनारस के युवकों को साथ लेकर इस राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए। उन्हें कैद करके मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। जब मजिस्टे्रट ने उनका नाम, पिता का नाम व घर कहां हैं, के विषय में पूछा तो चन्द्रशेखर ने बहुत की निर्भीकता से उत्तर दिया, मेरा नाम आजाद, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता तथा घर जेल हैं। इस पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें गुस्से में आकर चौदह कोड़े लगाने की सजा सुना दी।
उन्होंने प्रत्येक कोड़े का जवाब भारत मां के जयकारे के साथ दिया। इन कोड़ों की सजा ने आजाद को अंग्रेजों का पक्का दुश्मन बना दिया। वे देश की क्रांतिकारी गतिविधियों में अधिक से अधिक भाग लेने लगे। जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो आजाद नाराज हो गये। उसके बाद वे श्री सचिन्द्र सान्याल द्वारा गठित क्रांतिकारी दल हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी में शामिल हो गए। जिस समय सान्याल को कैद कर लिया गया तो उन्होंने इस दल का नेतृत्व किया तथा अपनी पार्टी के कार्य को जिम्मेदारी के साथ निभाया।
उन्होंने रूस तथा फ्रांस के क्रांतिकारियों की गतिविधियां, विचार, भारतीय दर्शन तथा मार्क्सवाद आदि का गंभीरता से अध्ययन किया। इस अध्ययन से चन्द्रशेखर आजाद के विचारों में एक नया मोड़ आया। वे देश की स्वतंत्रता, जनता की आर्थिक व सामाजिक मुक्ति का समाजवादी ढांचा बनाने के चिंतन में हमेशा व्यस्त रहे। थोड़े से समय में ही उन्होंने क्रांतिकारी दल की शाखाएं बना दी। इस प्रकार उन्होंने यह भी साबित कर दिया कि वे एक क्रांतिकारी के साथ-साथ एक अच्छे संगठनकर्ता भी हैं। उन्होंने ही सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव व बटुकेश्वर दत्त आदि क्रांतिकारियों को देश के लिए जीवन बलिदान करने के लिए उत्साहित किया था। जिस समय लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध करने पर शेरे पंजाब लाला लाजपत राय पुलिस की लाठियां लगने से शहीद हो गए तो इन क्रांतिकारियों का खून उबाल खा गया। उन्होंने पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट सांडर्स को जान से मार देने की योजना बनाई। जिस समय भगत सिंह व राजगुरु ने सांडर्स को गोली मारी तो आजाद भी उस समय मौके पर ही थे। गोली चली और सांडर्स अपनी मोटरसाइकिल से नीचे आ गिरा, परंतु एक अंगरक्षक जो एक भारतीय था ने उनका पीछा किया। आजाद ने उसे रोका क्योंकि वे किसी भी भारतीय का खून बहाना नहीं चाहते थे, परंतु वह नहीं रूका।
मजबूर होकर आजाद ने उसके ऊपर भी गोली चला दी और फिर भाग गए। सांडर्स की हत्या, केन्द्रीय एसेम्बली में बम फैंकना आदि क्रांतिकारी कार्यों में उन्होंने अपनी बहादुरी, तीव्र बुद्धि तथा असीम धैर्य का सबूत पेश किया था। भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने एसेम्बली हाल में बम फैंककर इन्कलाब जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए जो पर्चे फेंके थे उन पर कमाण्डर-इन-चीफ बलराम के हस्ताक्षर थे। ये बलराम कोई दूसरा नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों के शिरोमणि चन्द्रशेखर आजाद ही थे। आजाद, क्रांतिकारी गतिविधियों के बाद पुलिस की आंखों में धूल झोंककर भागने में सफल होते रहे। वे बहुत ही निडर व बहुत ही अच्छे निशाने बाज थे। वे सदैव कहते रहते थे कि हम दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं तथा आजाद ही रहेंगे। चन्द्रशेखर को 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अलफ्रेड पार्क में पुलिस इंसपेक्टर नाट बाबर तथा पुलिस सुप्रिटेन्डेन्ट ठाकुर विश्वेश्वर सिंह ने अपने पुलिस दल के साथ घेर लिया। आजाद ने अकेले ही नाट बाबर व विश्वेश्वर सिंह को अपनी पिस्तौल का निशाना बनाया। आजाद ने जिस समय देखा कि वे चारों तरफ से घिर चुके हैं तो उन्होंने मुकाबला करते हुए अपनी आखिरी गोली अपने ऊपर चला ली और वीर गति को प्राप्त हो गए। उनके इस बलिदान से राष्ट्र में एक अद्भुत जागृति पैदा हुई। चन्द्रशेखर आजाद हमेशा कहा करते थे कि गरीबों को इज्जत से रोटी मिले तो मेरी जान सस्ती है। भारत माता के इस महान सपूत ने केवल 25 वर्ष की छोटी उम्र में स्वतंत्रता के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी। उनका बलिदान उनके कार्य, देश वासियों को हमेशा देश की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए अपना सब कुछ त्यागने की शिक्षा देते रहेंगे।

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