
मुंबई। महाराष्ट्र सहित पूरे देश में लिम्फैटिक फिलेरियासिस (हत्तीरोग) के उन्मूलन के लिए ‘ट्रिपल ड्रग थेरेपी’ (आईडीए) को तेज किया जा रहा है। इस उपचार में आयव्हरमेक्टिन, डीईसी और अल्बेंडाजोल दवाओं का संयुक्त उपयोग किया जाता है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2027 तक देश से इस बीमारी के पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य तय किया है। मंगलवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि इस अभियान में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ राज्य सरकार सक्रिय रूप से काम कर रही है। महाराष्ट्र ने वर्ष 2017 में ही इस बीमारी से सबसे अधिक प्रभावित विदर्भ क्षेत्र को प्राथमिकता देने की पहल की थी, जिससे आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में राहत मिली है।
55 लाख नागरिकों को दवा देने का लक्ष्य
राज्य में ‘मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ (एमडीए) अभियान के तहत 12 राज्यों के साथ महाराष्ट्र में भी बड़े स्तर पर दवाएं वितरित की जा रही हैं। इस अभियान में पात्र नागरिकों को हर साल निवारक दवाएं दी जाती हैं। राज्य के कुछ जिलों में पारंपरिक दो दवाओं के बजाय ट्रिपल ड्रग थेरेपी लागू की गई है, जो अधिक प्रभावी मानी जा रही है। महाराष्ट्र में करीब 55 लाख लोगों को इस उपचार का लाभ देने का लक्ष्य रखा गया है।
विदर्भ में सबसे ज्यादा प्रभाव, विशेष अभियान जारी
विदर्भ क्षेत्र के गडचिरोली, भंडारा और चंद्रपुर जैसे जिलों में हत्तीरोग का अधिक प्रकोप है, जहां विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। राज्य के कुल मामलों में लगभग 75 प्रतिशत मरीज अकेले नागपुर विभाग में पाए गए हैं। सबसे अधिक प्रभावित जिलों में भंडारा, चंद्रपुर, नागपुर, गडचिरोली और गोंदिया शामिल हैं।
नागपुर में बड़ा सुधार, संक्रमण दर 1% से नीचे
विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रिपल ड्रग थेरेपी के कारण नागपुर ग्रामीण क्षेत्र में माइक्रोफिलेरिया (परजीवी) का प्रसार दर 2014 के 4.91% से घटकर 2024 तक 1% से कम हो गया है, जो इस अभियान की बड़ी सफलता मानी जा रही है। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे अफवाहों से दूर रहें और स्वास्थ्य कर्मियों की निगरानी में दवाएं लें। विशेषज्ञों का मानना है कि समाज की सक्रिय भागीदारी के बिना हत्तीरोग का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है।




