Saturday, February 14, 2026
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बंगाली लोक संस्कृति का विशिष्ट प्रतीक है मॉं दुर्गा को समर्पित धुनुची नृत्य

कुमार कृष्णन
नवरात्रि के पवित्र पावन समय में विशाल पंडालों में, रोशनी की लहरों के बीच, माँ दुर्गा की प्रतिमा साक्षात दुर्गा स्वरूप में विराजमान होती है, देवी की आँखों में जो करुणा और क्रोध का संयोग है, वही भाव धीरे धीरे मनुष्यों की देह में उतरने लगता है, इसी क्षण शुरू होता है एक ऐसा नृत्य, जिसमें शरीर का नृत्य नहीं, आत्मा का नर्तन दिखता है.. धुनुची नृत्य!! देवी दुर्गा को समर्पित है धुनुची नृत्य। कई लोगों का मानना ​​है कि धुनुची नृत्य के बिना दुर्गा पूजा अधूरी है। यह धुनुची नृत्य दुर्गा पूजा का एक महत्वपूर्ण बंगाली शक्ति नृत्य है, जो देवी दुर्गा के सामने किया जाता है। धुनुची नृत्य बंगाल और आसपास के कई राज्यों में दुर्गा पूजा के दौरान किया जाता है और भक्त इसमें उत्साह से भाग लेते हैं।
धुनुची नृत्य की शुरुआत सबसे पहले दुर्गा पूजा के दौरान जमींदारों के घरों में हुई थी। बाद में, यह परंपरा कोलकाता और बंगाल के विभिन्न हिस्सों में बारवारी पूजा के दौरान लोकप्रिय हो गई। आज, यह न केवल दुर्गा पूजा का एक अनिवार्य हिस्सा है, बल्कि एक प्रतियोगिता का रूप भी ले चुका है। पुराणों के अनुसार, महिषासुर का वध करने से पहले, देवी दुर्गा ने शक्ति संचय हेतु धुनुची नृत्य किया था।तब से, यह माना जाता है कि इस नृत्य के माध्यम से व्यक्ति स्वयं को पूर्णतः देवी दुर्गा के प्रति समर्पित कर सकता है और इससे सभी बुरी शक्तियां दूर हो जाती हैं। हाथों में जलती हुई धुनुची लेकर नृत्य करने की यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। धुनुची मूलतः एक मिट्टी का बर्तन होता है जिसमें जलते हुए नारियल के खोल या कोयले पर धूप जलाई जाती है। प्राचीन काल से ही इसका उपयोग वातावरण को शुद्ध करने और पूजा के दौरान देवताओं की पूजा के लिए किया जाता रहा है। धुनुची नृत्य पश्चिम बंगाल का एक पारंपरिक नृत्य है। माता की आरती के दौरान हाथ में मिट्टी का बर्तन लिया जाता है जिसमें जलती हुई धूपबत्ती होती है। यह नृत्य देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। नृत्य के दौरान जलती हुई धूपबत्ती से निकलने वाला धुआं वातावरण को भक्ति और ऊर्जा से भर देता है। धुनुची नृत्य दुर्गा पूजा के आनंद को कई गुना बढ़ा देता है। ढोल, बांसुरी, शंख और धुनुची के धुएं का मेल एक मनोरम वातावरण का निर्माण करता है। लिंग भेद के बिना हर कोई इस नृत्य में भाग लेता है और एक सामाजिक समागम का निर्माण करता है। धुनुची नृत्य बंगाली लोक संस्कृति का एक विशिष्ट प्रतीक है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। चाहे अष्टमी की सुबह हो या नवमी की रात, सप्तमी की शाम हो या दशमी की भोर, बंगाली दुर्गा पूजा धुनुची नृत्य के बिना अधूरी है। धुनुची को धूप और अगरबत्ती से जलाया जाता है,और जलती हुई धुनुची को कभी हाथ में, कभी मुंह में, कभी कमर पर रखकर ताल पर नृत्य किया जाता है। ढाक की थाप के साथ तालमेल बिठाने वाला यह नृत्य बंगालियों के लिए एक अनूठा आयाम रखता है। दुर्गा पूजा के दौरान संध्या आरती के समय धुनुची नृत्य किया जाता है। यह नृत्य बंगाल की समृद्ध परंपराओं और संस्कृति की झलक भी प्रस्तुत करता है। यह नृत्य केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं है, अब यह देश भर के कई राज्यों में किया जाता है। कई महिलाएं पारंपरिक लाल और सफेद साड़ियां पहनकर यह नृत्य करती हैं। धुनुची नृत्य केवल एक पारंपरिक नृत्य ही नहीं है, यह बंगाल की सांस्कृतिक विरासत, मान्यताओं और त्यौहारों का एक जीवंत प्रतीक है। दुर्गा पूजा जैसे प्रमुख त्यौहार के दौरान, धुनुची नृत्य उत्सव की रौनक बढ़ा देता है। यह नृत्य न केवल देवी की आराधना का एक अंग है, बल्कि सामूहिक एकता, सकारात्मकता और परंपरा की निरंतरता को भी बढ़ावा देता है।
धुनुची नृत्य ने आधुनिक युग में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़े रखा है। परंपरा केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि एक विरासत है जो समाज की आत्मा को पोषित करती है। इसलिए, दुर्गा पूजा के दौरान धुनुची नृत्य देखना और उसमें भाग लेना न केवल एक आनंददायक अनुभव है, बल्कि भक्ति, समर्पण और सांस्कृतिक गौरव का उत्सव भी है। दुर्गा पूजा के अंतिम दिन, विसर्जन से पहले, जब सबका मन भारी होता है, तब धुनुची नृत्य और उन्मुक्त हो जाता है, मानो लोग माँ को आखिरी बार दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने पूरे मन से भक्ति की है, धुएँ से भरा पंडाल, थकान से भरे चेहरे, लेकिन हर कदम माँ की छवि में घुला हुआ, यही वह तिलस्म है जो किसी दर्शक को भी भक्त बना देता है। कोई इसे भक्ति कहे,उत्सव कहे या लोकनृत्य, पर सच यह है कि धुनुची नृत्य एक आध्यात्मिक यात्रा है, इसमें समय थम जाता है, शरीर मिट्टी में बदल जाता है, और आत्मा माँ की आँखों में घुल जाती है,इसीलिए तो बंगाल में कहा जिता है कि मा’र पूजा शेष होये जाबे, किन्तु धुनो’र गन्धो ठाकबे (माँ की पूजा भले ही ख़त्म हो जाए, लेकिन धूप की गंध बनी रहेगी)


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