Monday, March 30, 2026
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हथियारों की दौड़: मानवता के लिए संकट!

आज तक अरबों, खरबों, ट्रिलियन डॉलर शक्ति प्रदर्शन, कमजोर राष्ट्रों पर हमला करने, जनसंहारक हथियार बनाने पर अपव्यय किए जा चुके हैं दुनिया में। किसी राष्ट्राध्यक्ष का इगो दुनिया में युद्ध लाता है। देश बर्बाद होते हैं, इंसानों की मौत होती है, फिर भी दुष्ट शासकों की रक्तपिपासा खत्म नहीं होती। प्रथम विश्वयुद्ध हो या द्वितीय विश्वयुद्ध, करोड़ों लोगों को जान गंवानी पड़ी थी, फिर भी दुनिया समझ नहीं रही। अमेरिका ने जापान में परमाणु बम गिराकर, हिटलर ने लाखों-लाख लोगों की हत्या कर दी, फिर भी दुनिया में खून की प्यास बुझी नहीं। आज भी दुनिया में युद्ध हो रहे हैं, गुटबाजियां हो रही हैं। परमाणु बम राष्ट्र की रक्षा के लिए अपरिहार्य माना गया, लेकिन सवाल यह है कि परमाणु बम वाले देश गैर-परमाणु बम वाले राष्ट्रों पर हमला क्यों करें। रूस-यूक्रेन का युद्ध वर्षों से लड़ा जा रहा, हथियारों के सौदागर आग में घी डालकर हथियार बेच रहे हैं, वे नहीं चाहते कि दुनिया में युद्ध कभी खत्म हो। पाकिस्तान आतंकवादी देश है, उसने अफगानिस्तान पर हमला कर एक अस्पताल को निशाना बनाया, हजारों बच्चे, जवान मारे गए। अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, बहाना यह कि ईरान परमाणु बम बना रहा, हमला स्कूल पर किया गया, उन बच्चों का क्या दोष, जिन्हें युद्ध का अर्थ ही नहीं मालूम।
ईरान ने हॉर्मूज का मार्ग रोक लिया, तो ऊर्जा संकट गहराने लगा। सवाल है, क्या इस ऊर्जा संकट के लिए अकेले वही दोषी है। अगर ईरान का परमाणु बम बनाना दुनिया के लिए खतरा बन सकता है, तो फिर अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, जर्मनी, इजरायल, पाकिस्तान और भारत ही क्यों रखें। सच तो यह है, जब-जब धूर्तों, दुष्टों के हाथों में सत्ता आती है, तो वह खून का प्यासा बना देती है। अपने से कमजोर पर हमला कर देता है, सिंडिकेट बनाकर। अत्याधुनिक मिसाइलें, पांचवीं-छठी पीढ़ी के स्टील्थ विमान बेचकर दौलत बटोरी जाती है। क्या कोई बता सकता है कि मनुष्य के लिए हथियार जरूरी है या शिक्षा, सुविधा, रोजगार, संरक्षण, चिकित्सा, सड़क, बिजली, पानी। दुनिया के धनी राष्ट्र क्यों नहीं गरीब राष्ट्रों की सहायता के लिए सोचते। कहने को संयुक्त राष्ट्र है, सुरक्षा परिषद है, लेकिन केवल दिखावे के लिए। हथियार की बिक्री और बैंक के कर्ज जाल में दुनिया को फंसाया जा रहा है। कोई दूसरे राष्ट्र पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए हथियार बना रहा है, तो तमाम अपनी रक्षा के लिए। दो वर्ष पूर्व दुनिया का सैन्य व्यय 2.718 ट्रिलियन डॉलर, यानी 27.18 लाख करोड़ रुपए था, जो 2023 की तुलना में 9.4 प्रतिशत वृद्धि हुई। लगातार दस वर्षों से वैश्विक सैन्य खर्च बढ़ता जा रहा, जो वैश्विक जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हिस्सा है। 2024 के आंकड़े के अनुसार अमेरिका ने 997 बिलियन डॉलर, चीन ने 314 बिलियन डॉलर, जर्मनी ने 88.5 बिलियन डॉलर खर्च किए। भारत मजबूरी में पाकिस्तान, चीन की शत्रुता के कारण सैन्य खर्च बढ़ाते हुए दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल हो गया है। 2025 के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज के अनुसार वैश्विक रक्षा पर लगभग 2.63 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया। 2025 का आंकड़ा और अधिक भयावह हो सकता है। भारत जैसा विकासशील राष्ट्र विवशता में 2024 में 7.19 लाख करोड़ रुपए सैन्य खर्च कर चुका है, जो 2023 की तुलना में 1.6 प्रतिशत अधिक रहा। अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी के बाद भारत को भी सैन्य खर्च बढ़ाना पड़ा, जो पाकिस्तान के सैन्य खर्च से कई गुना अधिक है। अगर भारत पर चीन और पाकिस्तान का दबाव नहीं होता, तो यह राशि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च की जा सकती थी। वैसे सच यह भी है कि भारत में सरकारी अपव्यय अत्यधिक है, भ्रष्टाचार असीमित है। जनता पर टैक्स पर टैक्स लाद दिए गए हैं। सड़कें बनती हैं और पहली ही बारिश में टूट जाती हैं। पुल उद्घाटन से पहले ही गिर जाते हैं। विकास के नाम पर जनता के टैक्स की खुली लूट होती है। हजारों सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए, शिक्षा का निजीकरण कर दिया गया। 40 प्रतिशत ग्रेजुएट युवा बेरोजगार हैं, और उतने ही कम वेतन पर लंबे समय तक काम करने को मजबूर हैं। विदेशी कर्ज पिछले 70 वर्षों में 55 लाख करोड़ था, लेकिन कुछ वर्षों में ही 201 लाख करोड़ तक पहुंच गया। वाहन खरीदते समय रोड टैक्स देने के बाद भी टोल टैक्स वसूला जाता है। ईरान द्वारा हॉर्मूज स्ट्रेट रोकने के बाद पेट्रोल और रसोई गैस के दाम बढ़ा दिए गए। सरकार कहती है कि देश में तेल और गैस की कमी नहीं है, तो फिर सिलेंडर के लिए लंबी कतारें क्यों लग रही हैं। एक सिलेंडर के बाद दूसरा लेने में 35 दिन का अंतर क्यों। सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और नीतिगत निर्णयों के कारण रूस और ईरान से तेल आयात प्रभावित हुआ है, जिससे महंगा तेल खरीदना पड़ रहा है। देश के सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसी क्या मजबूरी है, जिसके कारण नीतियां प्रभावित हो रही हैं। अंततः सवाल वही है, क्या युद्ध कभी खत्म होगा। क्या विश्व शांति केवल एक कल्पना बनकर रह जाएगी। जब तक सत्ता में बैठे लोग अहंकार और वर्चस्व की राजनीति से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक न युद्ध रुकेंगे, न ही मानवता सुरक्षित हो पाएगी

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