Monday, January 12, 2026
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स्वामी विवेकानंद जयंती: उत्सव और आत्ममंथन के बीच आज भी प्रासंगिक है स्वामी विवेकानंद

प्रवीण कक्कड़
पूरा देश 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती को युवा दिवस के रूप में मनाता है। आज स्वामीजी के बारे में सोचते हुए वर्तमान पीढ़ी को लेकर कई प्रश्न मन में उठते हैं। 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में जिस तरुण संन्यासी ने भारत की आध्यात्मिक गरिमा को विश्व के हृदय तक पहुँचाया था, उनकी स्मृति आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना को गौरवान्वित करती है। लेकिन उत्सव की इस रोशनी के बीच एक धुंधला, पर बेहद जरूरी प्रश्न हमारे सामने खड़ा है क्या हम स्वामीजी के विचारों को जी रहे हैं, या केवल उनकी स्मृति का अनुष्ठान कर रहे हैं? आज का युवा- जिसे विवेकानंद “राष्ट्र का निर्माता” कहते थे क्या सच में निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी ऊर्जा का विसर्जन कर रहा है? यह समय केवल जयघोष का नहीं, बल्कि गहरे आत्ममंथन का है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को केवल ऊँचे सपने थमा रहे हैं या उन्हें उन सपनों तक पहुँचने का सही मार्ग भी दिखा पा रहे हैं।
क्षमता का नहीं, बल्कि दिशा का संकट
युवा शक्ति का वर्तमान संकट क्षमता का नहीं, बल्कि दिशा का है। आज के युवा के पास अपार क्षमता है,शिक्षा, तकनीक और अवसर सब कुछ उसके पास है, परंतु ‘दृष्टि’ की कमी सबसे कमजोर कड़ी साबित हो रही है। स्वामी विवेकानंद ने भीतर सोई हुई शक्तियों को जगाने का आह्वान किया था, लेकिन आज वह शक्ति सोशल मीडिया की आभासी चमक, क्षणिक आकर्षणों और उपभोक्तावादी दौड़ में कहीं खोती जा रही है। विडंबना यह है कि जिस पीढ़ी के पास उंगलियों पर पूरी दुनिया का ज्ञान उपलब्ध है, वही पीढ़ी अपने भीतर के खालीपन को नशे, देर रात की पार्टियों और अनुशासनहीन जीवनशैली से भरने की कोशिश कर रही है। जिसे वे आधुनिकता समझ रहे हैं, वह प्रगति नहीं, बल्कि संस्कारों से कटकर एक लक्ष्यहीन भीड़ का हिस्सा बन जाना है। यही वह ‘मानसिक दरिद्रता’ है, जिसे स्वामी जी ने सांस्कृतिक पतन की संज्ञा दी थी।
हमारी सामूहिक विफलता
यहाँ दोष केवल युवाओं का नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, परिवार और समाज की सामूहिक विफलता पर भी है। हमने उन्हें ‘सफल’ होने की कला तो सिखाई, पर ‘सार्थक’ होने का विज्ञान नहीं सिखाया। हमने उन्हें गलाकाट प्रतियोगिता की दौड़ में धकेला, पर गिरकर संभलने का आत्मबल नहीं दिया। स्वामी जी ने युवाओं के लिए तीन आधारभूत स्तंभ बताए थे,शक्ति, आत्मविश्वास और चरित्र। आज हमारे पास भौतिक संसाधन तो हैं, पर मानसिक दुर्बलता बढ़ रही हैं,हाथों में डिग्रियाँ तो हैं, पर चरित्र निर्माण की पाठशालाएँ सूनी पड़ी हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम केवल उपदेश दे रहे हैं, या अपने उदाहरणों से उन्हें प्रेरित भी कर रहे हैं? समाज को यह समझना होगा कि युवा केवल सलाह से नहीं, बल्कि सही आदर्शों को देखकर बदलते हैं।
‘उठो, जागो’ आज अधिक प्रासंगिक
‘उठो, जागो’ स्वामी विवेकानंद का यह मंत्र आज इसलिए और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि आज की नींद आँखों की नहीं, बल्कि चेतना की है। उन्होंने भारतीय संस्कृति को ‘पुरातन’ नहीं, बल्कि ‘अनंत और आधुनिक’ बताया था, एक ऐसी संस्कृति जो समय के साथ स्वयं को परिष्कृत करती है, पर अपने मूल मूल्यों से विचलित नहीं होती। आज जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी क्रांति के युग में हैं, तब यह समझना आवश्यक है कि तकनीक मात्र एक साधन है, समाधान नहीं। समाधान तो केवल मानवीय मूल्यों और सुदृढ़ चरित्र में ही निहित है। यदि युवा अपनी ऊर्जा को रचनात्मकता के बजाय व्यर्थ के विवादों, गलत आदतों और दिखावटी आधुनिकता में नष्ट करेंगे, तो ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का हमारा गौरव ‘जनसांख्यिकीय संकट’ में बदलते देर नहीं लगेगी।
संवाद की जरूरत
राष्ट्रीय युवा दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्र के पुनरुद्धार का दायित्व है। युवाओं को आज कठोर आदेशों की नहीं, बल्कि संवाद की जरूरत है, उन्हें नियमों की बेड़ियों की नहीं, बल्कि सही दिशा की आवश्यकता है। हमें उन्हें यह समझाना होगा कि अनुशासन कोई बंधन नहीं, बल्कि स्वयं पर विजय पाकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना है। भारत तभी ‘विश्वगुरु’ बनेगा, जब उसका युवा डिजिटल स्क्रीन के मोहपाश से बाहर निकलकर धरातल की चुनौतियों से टकराएगा और अपने चरित्र की शुचिता से समाज को आलोकित करेगा। अंत में, यह प्रश्न हम सबके लिए है क्या हम अपने युवाओं को केवल एक ‘बाज़ार’ दे रहे हैं या एक संस्कारित राष्ट्र? क्या हम उन्हें सिर्फ सपनों के पंख दे रहे हैं या उन तूफानों से लड़ने का साहस भी, जिनसे टकराकर महापुरुषों का निर्माण होता है? युवा केवल भविष्य नहीं, वर्तमान की जीवित शक्ति हैं; और जब इस शक्ति का संगम संयम, चरित्र और कर्तव्य से होता है, तभी इतिहास के नए अध्याय लिखे जाते हैं।

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