Saturday, February 7, 2026
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व्यंग्य: सोशल मीडिया पर पुस्तक मेला

डॉ. सुधाकर आशावादी
प्रति वर्ष विश्व पुस्तक मेले का आयोजन राजधानी में किया जाता है। पुस्तक प्रेमियों के लिए यह वार्षिक पर्व के रूप में मनाया जाने वाला उत्सव है। आठ से दस दिन के आयोजन में पुस्तक प्रेमियों को इससे कितना लाभ होता है, कितना नहीं, यह तो शोध का विषय है, मगर इतना अवश्य है कि पुस्तक मेले में कब के बिछुड़े हुए लेखक आपस में मिल ही लेते हैं। जबसे सोशल मीडिया प्रभावी हुआ है, तबसे पुस्तक मेले का आकर्षण अधिक बढ़ गया है। यह मैं नहीं कहता, सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई अनेक पोस्ट कहती हैं। विभिन्न स्टालों से चाहे एक भी पुस्तक न खरीदी जाए, मगर रील बनाकर गंभीरता से पुस्तकों के कवर पेज देखने के दृश्य बताते हैं, कि भले ही पुस्तक मित्रों की संख्या न बढ़ी हो, मगर फेस बुक पर स्वयं को पुस्तक प्रेमी सिद्ध करने की होड़ अधिक मची रहती है। यूँ तो अनेक महानगरों में प्रति सप्ताह पुस्तकों के विमोचन समारोह आयोजित होते रहते हैं। लेखक होने का सुख क्या होता है, यह भी विमोचन समारोह में ज्ञात होता है, जब पुस्तक और लेखक की प्रशंसा में अनुप्रास अलंकार युक्त भाषा के स्तुति गान से लेखक स्वयं ही भ्रमित हो जाता है, कि अब से पहले उसे अपनी विशिष्टता का भान क्यों नहीं था। इसके उपरांत भी दस बीस प्रति छपवाने वाले लेखक के सामने पुस्तक बिक्री का संकट खड़ा रहता है। वह दो चार पुस्तकें उपहार स्वरूप मित्रों में बांटकर उनसे समीक्षा करने हेतु गुहार लगाता है, मगर निष्कर्ष में कुछ भी नहीं पाता है। पुस्तकों की समीक्षा बैठक में पुस्तक पढने के संकट पर चर्चा होती है। साहित्यकारों का दर्द छलकता है, कि अब पुस्तक पढ़ने वालों का अकाल पड़ गया है। कोई भी पुस्तक पढ़ने में अपना समय नहीं गंवाता। पाठक सोशल मीडिया पर ही आँखे गड़ाए रखता है। पुस्तक पढ़ने में उसकी रूचि नहीं रही। इसके उपरांत भी पुस्तक मेले में भीड़ कहाँ से आ रही है। महिलाएं सोशल मीडिया में विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह में बड़े लेखकों के साथ फोटो क्यों खिंचवा रही हैं। जब पुस्तक पढ़ने वालों की संख्या कम हो रही है, तब सैकड़ों प्रकाशन के स्टॉल्स पर नई नई पुस्तकों के विमोचन कैसे हो रहे हैं ? प्रश्न तो उत्पन्न होता ही है। वैसे कुछ फेसबुकियों द्वारा पुस्तक मेले में घूमने का दिन सुनिश्चित करके सार्वजनिक घोषणा करना तथा मेले में घूमने के वीडियो पोस्ट करने से ऐसी फीलिंग आना स्वाभाविक है, कि किसी भी लेखक को प्रमाणित लेखक सिद्ध होने के लिए पुस्तक मेले में हाजरी लगाना अनिवार्य हो। वैसे एक बात तो है, कि भले ही पुस्तकों की बिक्री न हो, पुस्तक लेखक पुस्तक प्रकाशन के बाद रॉयल्टी न मिलने का दिन रात रोना रोते रहें, लेकिन प्रकाशकों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती ही जा रही है। उनके द्वारा प्रकाशित की जाने वाली पुस्तकों की संख्या भी नियमित रूप से बढ़ रही है। यदि पाठकों की कमी के चलते भी प्रकाशन संस्थान बढ़ रहे हैं, पुस्तक मेले में पाठकों व लेखकों की भीड़ बढ़ रही है, तब यह संसार का आठवाँ आश्चर्य नहीं तो क्या है?

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