Saturday, August 30, 2025
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रणथम्भौर: जहां ऋद्धि-सिद्धि सहित पूरे परिवार के साथ विराजित हैं भगवान गणेश

अंजनी सक्सेना
राजस्थान में रणथम्भौर के गणेशजी ऋद्धि-सिद्धि और भण्डार को भरने वाले विघ्नहरण मंगलकरण देवता हैं। लोक मान्यता है कि संकट के समय जो देव रक्षा करने में समर्थ हैं गणेशजी उनमें प्रथम देवता हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के अवसर पर दिल्ली-मुम्बई रेलवे लाइन पर स्थित सवाई माधोपुर जंक्शन के पास स्थित दुर्ग रणथम्भौर पर स्थित गणेश मंदिर पर विशाल मेला लगता है। मेले में रंग-बिरंगे परिधानों से सजे-धजे ग्रामीणों की उमंग श्रद्धा और लोक भजनों की स्वर लहरी आध्यात्मिक चेतना की एक नई लहर उत्पन्न कर देती है। ठेठ ग्रामीण अंचल का अंगूठा छाप देहाती जीव ही नहीं बल्कि पढ़े लिखे शहरी बाबू भी ठप्पे से कनक दण्डवत करता अथवा परिक्रमा करता हुआ रणभंवर सूँ आऔ जी गजानंदजी की टेर लगाता है। मेले के दिनों में पूरा दुर्ग क्षेत्र हरियाली से आच्छादित पर्वत श्रेणियों से नयनरंजक दृश्य प्रस्तुत करता है। वीरान खण्डहर, जन कलरव से आबाद हो उठते हैं। रेलगाडिय़ों पर दर्शनार्थियों की भीड़ डिब्बों में लटकी चली आती है तो बसों में भी अपनी क्षमता से भी 4-5 गुना तक भीड़ हो उठती है। बैलगाड़ी, ऊंट, गाड़ी, ट्रैक्टर ट्राली, साइकल, रिक्शा जो भी साधन जुटता है, उससे समीपवर्ती देहातों के ही नहीं, दूर-दूर तक के श्रद्धालु, धर्मावलम्बी पहुंचते है। रणथम्भौर के गणेशजी का यह दुर्ग पर अवस्थित विग्रह चौहान कालीन ऐतिहासिक गरिमा युक्त विग्रह है। तिरिया तेल हमीर हठ चढ़े न दूजी बार वाली कहावत के नायक महाराजा हम्मीर इन गणेश जी का प्रथम पूजन करते थे। जन-श्रुतियों के आधार पर कई ऐतिहासिक कथाओं में यह तथ्य भी रेखांकित मिलता है कि महाराजा हम्मीर की महारानी और पुत्री भी इनका पूजन विधि-विधान से करके ही शेष काम करती थीं। इस मूर्ति के प्राकट्य को लेकर भी लोक जीवन में कई लोक कथाएं प्रचलित हैं। सर्वाधिक प्रचलित कथा के अनुसार वर्ष 1299 से 1301 के मध्य यहां के महाराजा हमीर देव चौहान और दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में खिलजी ने इस दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया था। तभी एक रात्रि में महाराजा हमीर देव को स्वप्न में गणेश जी दिखाई दिए। स्वप्न में गणेश जी ने दुर्ग में ही एक स्थान का संकेत दिया। अगले दिन सुबह किले की दीवार पर ठीक उसी स्थान पर गणेश जी की मूर्ति प्रगट हो गई। महाराजा ने वहीं पर पूरे विधि विधान से पूजा सम्पन्न की और कुछ ही समय में वर्षों से चल रहा यह युद्ध समाप्त हो गया। बाद में राजा ने गणेश जी द्वारा बनाए गए स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया। संपूर्ण विश्व में यह एक ऐसा अनोखा मंदिर है जहां भगवान गणेश अपने पूरे परिवार, पत्नियों ऋद्धि-सिद्धि और दोनों पुत्रों शुभ एवं लाभ के साथ विराजमान हैं। एक अन्य लोककथा में कहा जाता है कि जब यह मूर्ति स्वयं प्रकट हो रही थी एक शिला खण्ड से, तब किसी महिला ने चक्की चलाकर अनाज पीसना शुरू कर दिया। गणेशजी चक्की की स्वर-लहरी पर मुग्ध होकर वहीं ठिठक कर रुक गए। तब से यह प्रतिमा उसी अद्र्ध विकसित स्थिति में पूज्य है। वैसे यह त्रिनेत्र धारी गणेश प्रतिमा पर्वत में ही लटके एक बहुत भारी शिलाखंड में ही प्राकृतिक रूप से बनी हुई है। उसी के आगे कालान्तर में मंदिर का निर्माण किया गया है। एक अन्य प्रचलित लोककथा के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण एवं रुक्मणि जी का विवाह हो रहा था तब श्री कृष्ण अपने विवाह में गणेश जी को निमंंत्रण देना भूल गए। नाराज होकर गणेश जी के वाहन मूषकों (चूहों) ने श्री कृष्ण के रथ के आगे बिल खोदकर उनके रथ को रोक दिया। तब श्री कृष्ण ने रणथम्भौर जाकर गणेश जी को आमंत्रित किया और उन्हें मनाया। यह भी माना जाता है कि भगवान श्री राम ने भी लंका जाने से पहले गणेश जी के इसी स्वरूप का अभिषेक किया था। वैसे तो रणथम्भौर दुर्ग का अपने आप में ऐतिहासिक महत्व है। वहां पर राष्ट्रीय उद्यान है। प्राकृतिक सौंदर्य लुटाता वैभव है किन्तु लाखों श्रद्धालु तो रणथम्भौर के गणेशजी को ही पूजने, विवाह के अवसर पर सपरिवार न्योतने आदि के लिए आते हैं। यदि यह मंदिर नहीं होता तो रणथम्भौर का दुर्ग अपनी ऐतिहासिक गरिमा को उभारने में कम से कम इस माहौल में तो अक्षम ही रहता। आज भी लोगों की दुर्ग देखने, उसके ऐतिहासिक गौरव, पर्यटन स्थलीय महत्व पर नहीं, बल्कि गणेशजी पर आस्था है। अनेक तरह की यात्रागत परेशानियों को सहकर भी वे वहां पर अपनी अटूट श्रद्धा और विश्वास व्यक्त करने आते हैं। परिक्रमा का हिस्सा विभिन्न धर्मावलम्बियों के मंदिरों, देवरों, मस्जिदों से भरा पड़ा है, जिनमें दिगम्बर जैन मंदिर, रघुनाथजी, शिव, काली माता तथा पीरजी की दरगाह तथा मस्जिद मुख्य है। विविधता में एकता के पोषक हिन्दू धर्मावलम्बी सभी धर्मस्थलों पर अपनी श्रद्धा के अनुरूप पूजा-पाठ करता हुआ परिक्रमा सफल करता है। वैवाहिक निमंत्रण-पत्रों का तो यहां देश-विदेश तक से तांता लगा रहता है। भावुक भक्त गणेशजी को विवाह में आमंत्रित करते हैं। पुजारी नित्य इन सभी निमंत्रण-पत्रों को गणेशजी को सुनाता है। भक्तों की आस्था देखिए कि कई तो ऋद्धि-सिद्धि सहित गणेशजी को विवाह में बुलाने के लिए किराया तक भेजते हैं। वे मानते हैं कि प्रथम निमंत्रण गणेशजी को देकर सारा काम सफलता से पूरा करवा लेंगे। मेले के अवसर पर तो विभिन्न रंगों के पुष्पहारों, लड्डुओं के ढेर, नारियलों की लुढ़कन व बधारने (फोड़ने) की बहार, गणेश वाहन मूषकों की उछलकूद अनुपम दृश्य उपस्थित करते हैं। मेले के दौरान भक्तों की भीड़ के कारण पंक्तिबद्ध दर्शनार्थी भी कई घंटों की तपस्या के बाद ही गणेशजी मूर्ति के आगे दर्शन के लिए जा पाते हैं।

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