
मुंबई। एक यमनी नागरिक के खिलाफ लंबित नारकोटिक्स मामलों के कारण सरकारी खजाने पर पड़ रहे अतिरिक्त बोझ को गंभीरता से लेते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने संबंधित ट्रायल कोर्ट को कार्यवाही में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस अजेय गडकरी और आर.आर. भोंसले की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक आरोपी के खिलाफ दर्ज मामलों का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक उसे उसके देश यमन वापस नहीं भेजा जा सकता, और ऐसे में उसे भारत में ही हिरासत में रखना पड़ेगा। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस स्थिति में आरोपी को भोजन, आवास और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना पड़ता है, जिससे सरकारी खजाने पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ रहा है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत को निर्देश दिया कि आरोपी के खिलाफ दर्ज दो मामलों को यथाशीघ्र, संभव हो तो तीन महीनों के भीतर, निपटाया जाए।
वीज़ा की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख
हाई कोर्ट यह टिप्पणी गलाल नाजी मोहम्मद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कर रहा था। याचिका में फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस को निर्देश देने की मांग की गई थी कि उसे भारत में रहने के लिए वीज़ा प्रदान किया जाए। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह वैध दस्तावेज़ों के साथ भारत आया था, लेकिन वर्ष 2024 में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने उसे नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत दर्ज दो मामलों में गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद से वह न्यायिक हिरासत में है।
वीज़ा समाप्त, डिपोर्टेशन पर कानूनी अड़चन
याचिका में यह भी कहा गया कि आरोपी का वीज़ा पहले ही समाप्त हो चुका है। चूंकि उसके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, इसलिए उसका वीज़ा न तो बढ़ाया जा रहा है और न ही उसे उसके देश वापस भेजा जा सकता है। इस कारण वह एक तरह से कानूनी दुविधा में फंसा हुआ है। केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता अरुणा पाई ने अदालत को बताया कि गृह मंत्रालय ने ऐसे मामलों के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तय किया है। इसके अनुसार, आरोपी को वीज़ा विस्तार के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन करना होगा, जिस पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लिया जाएगा। इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर एसओपी के अनुसार अपना आवेदन प्रस्तुत करे। साथ ही अदालत ने अभियोजन एजेंसी को भी निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट के साथ पूरा सहयोग करे, ताकि लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा हो सके। हाई कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि लंबे समय तक मामलों को लंबित रखना न केवल न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है, बल्कि इससे प्रशासनिक और आर्थिक संसाधनों पर भी अनावश्यक दबाव पड़ता है, जिसे टालना आवश्यक है।



