मुंबई। शिवसेना प्रमुख रहे बालासाहेब ठाकरे की 100वीं जयंती के अवसर पर शुक्रवार को मुंबई के षण्मुखानंद हॉल में आयोजित विशेष कार्यक्रम में महाराष्ट्र की राजनीति का एक दुर्लभ और भावनात्मक दृश्य देखने को मिला। वर्षों बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक ही मंच पर साथ नजर आए, जिसने न केवल राजनीतिक बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी गहरी छाप छोड़ी। इस अवसर पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने मौजूदा राजनीतिक हालात पर तीखा प्रहार करते हुए कहा- आज के हालात देखकर लगता है कि अच्छा है कि आज बालासाहेब नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान महाराष्ट्र की राजनीति ‘गुलामों का बाजार’ बन गई है, जहां विचारधाराओं की नहीं बल्कि लोगों की नीलामी हो रही है। राज ठाकरे ने कहा कि यदि आज बालासाहेब जीवित होते, तो इस राजनीतिक गिरावट को देखकर उन्हें गहरी पीड़ा होती और वे इसे कभी स्वीकार नहीं कर पाते। राज ठाकरे ने अपने भाषण में यह भी कहा कि पिछले 20 वर्षों में उन्होंने और उद्धव ठाकरे ने बहुत कुछ सीखा और समझा है, और अब समय आ गया है कि पुरानी कड़वाहट को पीछे छोड़कर आगे बढ़ा जाए। यह टिप्पणी मंच पर बैठे उद्धव ठाकरे की उपस्थिति में आई, जिसे राजनीतिक हलकों में खास महत्व के साथ देखा जा रहा है। अपने संबोधन में राज ठाकरे पहली बार 2005 में शिवसेना से अलग होने के दर्द पर खुलकर बोले। उन्होंने कहा- शिवसेना छोड़ना मेरे लिए केवल पार्टी छोड़ना नहीं था, बल्कि अपने घर से बाहर निकलने जैसा था। पिता का साया पहले ही उठ चुका था और फिर अपने चाचा बालासाहेब से दूर होना मेरे जीवन का सबसे कठिन दौर था। राज ठाकरे की इन भावुक बातों के दौरान मंच पर मौजूद रश्मि ठाकरे अपने आंसू नहीं रोक सकीं। पूरे सभागार में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। राज ठाकरे ने बालासाहेब ठाकरे के मानवीय और पारिवारिक पक्ष को भी याद किया। उन्होंने बचपन का एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि जब वे उबलते पानी से झुलस गए थे, तब बालासाहेब रोज सुबह स्वयं डेटॉल और कपास लेकर उनके घाव साफ करते थे। उन्होंने कहा कि राजनीति से इतर बालासाहेब एक बेहद संवेदनशील कलाकार और पारिवारिक व्यक्ति थे। अपने भाषण में राज ठाकरे ने बालासाहेब ठाकरे से जुड़ी कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का भी जिक्र किया—राज कपूर ने फिल्म मेरा नाम जोकर के दौरान विवाद के समय बालासाहेब से संपादन से जुड़े सुझाव मांगे थे। अमिताभ बच्चन के बोफोर्स मामले में फंसने पर बालासाहेब ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह को पत्र लिखने का मसौदा तैयार किया था, जिससे हालात संभले। माइकल जैक्सन मुंबई दौरे के दौरान बालासाहेब के व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने दोबारा ‘मातोश्री’ आने की इच्छा जताई थी। राज ठाकरे ने कहा कि बालासाहेब केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि ‘चलता-फिरता विश्वविद्यालय’ थे। उनके कार्टून की हर रेखा में स्पष्टवादिता, साहस और सत्ता से टकराने का आत्मविश्वास झलकता था। उन्होंने जनता से अपील की कि बालासाहेब के शताब्दी वर्ष में उन्हें केवल याद न किया जाए, बल्कि उनके भाषणों, साक्षात्कारों और व्यंग्यचित्रों को नए नजरिए से पढ़ा और समझा जाए।





