
राज्यपाल की उपस्थिति में ‘मुंबई क्लायमेट वीक’ का समापन
मुंबई। कृषि क्षेत्र में रसायनों के बढ़ते उपयोग से खेती और पर्यावरण दोनों को गंभीर नुकसान हो रहा है। रासायनिक खेती के दुष्परिणाम अत्यंत घातक हैं—एक ओर पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, तो दूसरी ओर गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। इसलिए जब वैश्विक पर्यावरण संरक्षण पर विचार किया जाए, तो कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी केंद्र में रखा जाए। यह आह्वान महाराष्ट्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने किया। वे गुरुवार को मुंबई स्थित जियो वर्ल्ड सेंटर में आयोजित ‘मुंबई क्लायमेट वीक’ के समापन समारोह में संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्य एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री आशीष शेलार, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री पंकजा मुंडे, मुंबई की महापौर रितु तावडे, पर्यावरण विभाग की प्रधान सचिव जयश्री भोज, राज्यपाल के सचिव प्रशांत नारनवरे, सहसचिव एस. राममूर्ति, प्रोजेक्ट मुंबई के शिशिर जोशी एवं जलज दानी सहित अनेक पर्यावरण प्रेमी उपस्थित थे। तीन दिवसीय ‘मुंबई क्लायमेट वीक’ सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर विषय पर देश-विदेश के विशेषज्ञों ने मंथन किया। राज्यपाल ने आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति प्रकृति-पूजक रही है। प्राचीन काल में शिक्षा प्रकृति के सान्निध्य में दी जाती थी, किंतु आधुनिक भोगवादी प्रवृत्तियों के कारण पर्यावरण का ह्रास हुआ है। उन्होंने कहा कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान जब मानवीय गतिविधियाँ सीमित हुईं, तब नदियाँ स्वच्छ और आकाश निर्मल दिखाई देने लगा—यह दर्शाता है कि पर्यावरण क्षरण का प्रमुख कारण मानवीय हस्तक्षेप है। राज्यपाल ने यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न ‘नाइट्रस ऑक्साइड’ जैसी गैसों के दुष्प्रभावों पर प्रकाश डाला। इन रसायनों के अवशेष भूजल और खाद्य श्रृंखला में पहुँचकर गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती से भूमि की उर्वरता घटती है, जबकि प्राकृतिक खेती से मिट्टी की सेहत, जैविक कार्बन और भूजल स्तर में सुधार होता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन’ के माध्यम से प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन दिए जाने का भी उल्लेख किया। एक समाचार पत्र की रिपोर्ट का हवाला देते हुए राज्यपाल ने बताया कि 105 माताओं के दूध में कीटनाशकों के अंश पाए गए हैं और इस गंभीर विषय पर समाज को सजग होने की आवश्यकता है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कार्रवाई आवश्यक – पंकजा मुंडे
पर्यावरण मंत्री पंकजा मुंडे ने कहा कि अतीत में विकास और आधारभूत संरचना पर अधिक जोर दिया गया, जबकि पर्यावरण की उपेक्षा की गई। इसके परिणाम आज वैश्विक स्तर पर सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण का प्रश्न किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्वरूप का है, इसलिए समाधान भी वैश्विक दृष्टिकोण से ही संभव है। उन्होंने कहा कि मिट्टी, पानी और वायु पर्यावरण के तीन प्रमुख घटक हैं, जिन पर औद्योगिकीकरण और बुनियादी ढांचे के विस्तार का दबाव बढ़ा है। आर्थिक रूप से पिछड़े देशों ने विकास के लिए पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले उद्योगों को अनुमति दी, जिसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है।
जलवायु लचीलापन के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी –महापौर रितु तावडे
महापौर रितु तावडे ने कहा कि शहर का विकास और जलवायु जिम्मेदारी साथ-साथ चलनी चाहिए। जलवायु लचीलापन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों, निजी उद्योगों, वित्तीय भागीदारों, अनुसंधान संस्थानों और नागरिकों के संयुक्त प्रयास से ही संभव है। इसके लिए मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी, नवाचारपूर्ण वित्तपोषण, तकनीकी सहयोग और नागरिकों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आवश्यक हैं। ‘मुंबई क्लायमेट वीक’ के माध्यम से विभिन्न देशों के विशेषज्ञों के साथ विचार-विनिमय का अवसर मिला, जिससे पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस रणनीतियाँ बनाने में सहायता मिलेगी।




