
सातारा। राज्य की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में मराठी भाषा ही एकमात्र अनिवार्य भाषा रहेगी। किसी भी अन्य भारतीय भाषा को अनिवार्य नहीं किया जाएगा, वे केवल वैकल्पिक स्वरूप में ही रहेंगी। अन्य भाषाएं किस कक्षा से शुरू की जाएं, इस पर अंतिम निर्णय डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद लिया जाएगा। यह स्पष्ट जानकारी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दी। सातारा के शाहू स्टेडियम में आयोजित 99वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि मराठी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की आत्मा है। शुक्रवार को भाषा नीति पर स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्होंने दोहराया कि मराठी की अनिवार्यता बनी रहेगी, लेकिन किसी अन्य भाषा को थोपने का कोई सवाल नहीं है। इस विषय पर गठित समिति की रिपोर्ट अब अंतिम चरण में है। सम्मेलन का उद्घाटन वरिष्ठ साहित्यकार एवं विचारक डॉ. मृदुला गर्ग ने किया। इस अवसर पर लोक निर्माण मंत्री एवं स्वागताध्यक्ष शिवेंद्रसिंहराजे भोसले, ग्रामीण विकास मंत्री जयकुमार गोरे, सम्मेलन अध्यक्ष विश्वास पाटील, 98वें सम्मेलन की अध्यक्ष डॉ. ताराबाई भवाळकर, विधायक अतुल भोसले और मनोज घोरपडे, पुणे संभागीय आयुक्त डॉ. चंद्रकांत पुलकुंडवार, नगराध्यक्ष अमोल मोहिते, अखिल भारतीय मराठी साहित्य महामंडल के अध्यक्ष प्रा. मिलिंद जोशी, सम्मेलन के कार्याध्यक्ष विनोद कुलकर्णी, भारती विद्यापीठ के कुलपति डॉ. शिवाजीराव कदम, उद्योगपति एवं संरक्षक फरोख कूपर, जिल्हाधिकारी संतोष पाटील सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। मुख्यमंत्री फडणवीस ने सम्मेलन अध्यक्ष विश्वास पाटील के उपन्यास ‘पानिपत’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कृति ने उनके वैचारिक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि मराठी माटी से जुड़ा, इतिहास, समाज और मानव केंद्रित साहित्य ही मराठी साहित्य की असली पहचान है। वारकरी साहित्य, संत ज्ञानेश्वर महाराज, संत नामदेव महाराज और संत तुकाराम महाराज के विचारों का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि ‘शब्देचि रत्ने’ की परंपरा आज भी समाज को दिशा दे रही है। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा निर्मित राज्यव्यवहार कोश का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे मराठी को प्रशासनिक भाषा का दर्जा मिला। उन्होंने दोहराया कि मराठी के संरक्षण और संवर्धन के लिए राज्य सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अब केवल दर्जा ही नहीं, बल्कि मराठी को व्यापक जनस्वीकृति दिलाना सरकार का लक्ष्य है। जेएनयू जैसी संस्थाओं में मराठी अध्ययन केंद्र शुरू किए जाने की भी जानकारी उन्होंने दी। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि मराठी साहित्य क्षेत्र में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। साहित्य सृजन समाज की संवेदनाओं को विस्तार देने का माध्यम है, इसलिए आलोचना और प्रशंसा दोनों से साहित्य को समृद्ध किया जाना चाहिए। सातारा की साहित्यिक परंपरा का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि अब तक हुए 98 अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलनों में से सबसे अधिक छह सम्मेलन सातारा जिले में आयोजित हुए हैं और सर्वाधिक 17 सम्मेलन अध्यक्ष भी इसी जिले से रहे हैं। सम्मेलन के उत्कृष्ट आयोजन के लिए उन्होंने महाराष्ट्र साहित्य परिषद, शाहूपुरी शाखा, मावळा फाउंडेशन और सभी सहयोगी संस्थाओं का आभार व्यक्त किया। उद्घाटक डॉ. मृदुला गर्ग ने अपने भाषण में राष्ट्रीय स्तर पर मराठी साहित्य की समीक्षा करते हुए नामदेव ढसाल, मल्लिका अमर शेख, उर्मिला पवार, शरणकुमार लिंबाळे, विजय तेंडुलकर और महेश एलकुंचवार के साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया। सम्मेलन अध्यक्ष विश्वास पाटील ने अपने अध्यक्षीय भाषण में सातारा के गौरवशाली इतिहास और मराठी साहित्य की समृद्ध परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि चाहे कंधे पर कोई भी ध्वज हो, उसकी डंडी मराठी की ही होनी चाहिए और चाहे किसी की भी पालकी हो, उसका गोंडा मराठी का ही होना चाहिए। उन्होंने मराठी भाषा के संवर्धन के लिए सतत कार्य करने का संकल्प भी व्यक्त किया। पूर्व सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. ताराबाई भवाळकर ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि मराठी भाषा का दायरा लगातार बढ़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में नए लेखक और प्रकाशक उभर रहे हैं और यदि उन्हें प्रोत्साहन मिले तो मराठी का वास्तविक विकास संभव है। स्वागताध्यक्ष शिवेंद्रसिंहराजे भोसले ने कहा कि शताब्दी की ओर बढ़ रहे साहित्य सम्मेलन का सातारा में आयोजन होना गर्व का विषय है और मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने के बाद यह पहला सम्मेलन है। अखिल भारतीय मराठी साहित्य महामंडल के अध्यक्ष प्रा. मिलिंद जोशी ने कहा कि कर्नाटक सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले मराठी भाषियों के साथ महामंडल मजबूती से खड़ा है। सम्मेलन के कार्याध्यक्ष विनोद कुलकर्णी ने प्रास्ताविक प्रस्तुत किया, जबकि साहित्य महामंडल की कार्यवाह सुनीताराजे पवार ने आभार प्रदर्शन किया।




