Saturday, February 14, 2026
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जेन-जी आंदोलन की जांच में बड़ा कदम: पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली समेत पांच शीर्ष नेताओं पर यात्रा प्रतिबंध

काठमांडू। नेपाल में जेन-जी आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और गोलीबारी की जांच में बड़ा कदम उठाते हुए न्यायिक आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सहित पांच शीर्ष व्यक्तियों पर यात्रा प्रतिबंध लगा दिया है और उनके पासपोर्ट निलंबित करने के निर्देश दिए हैं। पूर्व न्यायाधीश गौरी बहादुर कार्की की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने साफ कहा है कि आरोपियों को कभी भी जांच के लिए बुलाया जा सकता है, इसलिए विदेश यात्रा पर रोक आवश्यक है। आयोग ने नेपाल पुलिस, सशस्त्र प्रहरी बल और राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग को इन सभी की गतिविधियों पर करीबी नजर रखने और दैनिक रिपोर्टिंग करने का आदेश दिया है। जिन पर कार्रवाई हुई है उनमें उस समय के प्रधानमंत्री ओली, तत्कालीन गृह मंत्री रमेश लेखक, गृह सचिव गोकर्ण मणि दुवाडी, राष्ट्रीय जांच विभाग के प्रमुख हुत राज थापा और काठमांडू के तत्कालीन मुख्य जिला अधिकारी छवि रिजाल शामिल हैं। आयोग की अध्यक्ष कार्की ने कहा कि जांच को निष्पक्ष और व्यवस्थित बनाने के लिए अतिरिक्त मानव संसाधन की आवश्यकता है और इस संबंध में गृह मंत्रालय से सहयोग मांगा गया है। गौरतलब है कि 8 और 9 सितम्बर को हुए जेन-जी प्रदर्शनों में गोलीबारी और हिंसा के चलते कम से कम 19 युवाओं की मौत हुई थी, जिसके बाद अंतरिम सरकार ने न्याय सुनिश्चित करने का वादा किया था। आयोग का यह निर्णय नेपाल की राजनीति में अब तक की सबसे हाई-प्रोफाइल कार्रवाइयों में गिना जा रहा है। उधर, इस कदम से एक दिन पहले ही ओली ने अपने और अन्य अधिकारियों पर पासपोर्ट फ्रीज करने की संभावित खबरों पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने पार्टी कार्यक्रम में कहा था कि “सरकार मेरे विशेषाधिकार छीनने, पासपोर्ट रोकने और मुकदमे दर्ज करने की बात कर रही है। वे देश को असुरक्षा की ओर धकेल रहे हैं, जबकि सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। यह घटनाक्रम न केवल जेन-जी आंदोलन से उपजे आक्रोश और जवाबदेही की मांग को दर्शाता है, बल्कि नेपाल की सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक तनाव को भी और गहरा कर रहा है। ईडी के अनुसार, इसके बाद कंपनी को कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) में ले जाया गया, जिसके परिणामस्वरूप घर खरीदारों और अन्य वित्तीय लेनदारों (एफसी) से जुड़ी एक समाधान योजना को मंजूरी मिली। राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने आदेश दिया कि कुछ संपत्तियां घर खरीदारों को सौंप दी जाएं, जिन्हें वित्तीय लेनदार माना गया था, जबकि शेष संपत्तियों का परिसमापन किया जाना था। घर खरीदारों द्वारा 15 वर्षों से अधिक समय तक प्रतीक्षा करने के बावजूद, प्रस्तावित समाधान के परिणामस्वरूप घर खरीदारों को इन परियोजनाओं में अपने निवेश को साकार करने के लिए अतिरिक्त धनराशि के रूप में अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ रही है। अधिकांश घर खरीदारों ने 2010 से पहले अपने धन का निवेश किया था, और उन्हें अपने फ्लैटों या स्थानों का कब्जा मिलने में अतिरिक्त समय लगने की उम्मीद है। वजह, पूर्व प्रमोटरों के चलते कई परियोजनाएं पूरी नहीं हुई हैं, जिन्होंने 2010 से निर्माण रोक दिया था। इस मामले में, समाधान पेशेवर से एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चला है कि कंपनी ने अपने आरोपी प्रमोटरों के माध्यम से गुरुग्राम और फरीदाबाद में आठ अलग-अलग परियोजनाओं पर 12 वर्षों में 1000 करोड़ रुपये से अधिक एकत्र किए और विकास के लिए केवल आंशिक धन का उपयोग किया। आपराधिक हेराफेरी, धोखाधड़ी, जालसाजी और धोखाधड़ी के माध्यम से अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए भूमि और अन्य संपत्तियां हासिल करने के लिए धन की हेराफेरी की।

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