
मुंबई। मुंबई के विले पार्ले (पूर्व) स्थित कांबली वाडी में 90 साल पुराने 1008 दिगंबर जैन मंदिर को 16 अप्रैल की सुबह बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) द्वारा अचानक गिरा दिए जाने पर महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने कड़ी आपत्ति जताई है और इसे आपराधिक कृत्य बताया है। आयोग ने कहा कि बीएमसी ने यह कार्रवाई हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई से ठीक पहले की, जिससे यह प्रतीत होता है कि मंदिर को गिराने की जल्दबाजी जानबूझकर दिखाई गई। आयोग के अध्यक्ष प्यारे जिया खान की अध्यक्षता में मंगलवार को इस मुद्दे पर सुनवाई हुई, जिसमें यह भी सामने आया कि बीएमसी ने मंदिर खाली कराने के दौरान धार्मिक ग्रंथों को बाहर फेंका और बल प्रयोग किया। उन्होंने बीएमसी से यह जवाब मांगा है कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला क्यों न दर्ज किया जाए। आयोग ने यह भी पाया कि बीएमसी ने विध्वंस की योजना पहले से बनाई थी, जबकि विध्वंस आदेश पर केवल एक दिन पहले हस्ताक्षर किए गए थे और 8 अप्रैल के सिविल कोर्ट के स्थगन आदेश को हटाए जाने से पहले ही कार्रवाई शुरू कर दी गई थी। इसके अलावा, बीएमसी ने मंदिर के परिसर में स्थित एक होटल और रेस्तरां को छोड़ दिया, जिसके मालिक पर विध्वंस को प्रभावित करने का आरोप है, जबकि होटल पर कई अवैध निर्माण के आरोप पहले से मौजूद हैं। आयोग ने यह भी कहा कि विध्वंस से पहले बीएमसी ने न तो चैरिटी आयुक्त से अनुमति ली और न ही अल्पसंख्यक आयोग से परामर्श किया। मंदिर ट्रस्ट ने आरोप लगाया कि तोड़फोड़ के दौरान मंदिर के दानपात्र से गहने और पैसे गायब हो गए और श्रद्धालुओं से पुलिस ने मारपीट की, जिससे कुछ को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस पर आयोग ने पुलिस उपायुक्त (जोन-8) मनीष कलवानिया को मंदिर से चोरी हुई सामग्री की शिकायत दर्ज करने में ट्रस्ट की मदद करने के निर्देश दिए हैं। आयोग के उपाध्यक्ष चेतन देधिया को मंदिर स्थल और होटल परिसर का संयुक्त निरीक्षण करने का आदेश भी दिया गया है। आयोग ने बीएमसी से यह भी पूछा है कि अब तक कितने अवैध ढांचे सुबह-सुबह इसी तरह गिराए गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने जैन समुदाय में आक्रोश पैदा कर दिया है और बीएमसी की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।




