Monday, January 12, 2026
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संपादकीय: सच है गुदड़ी में लाल होते हैं पैदा

गुण-अवगुण किसी भी व्यक्ति में माता-पिता, समाज, शिक्षा और संस्कार से ही आते हैं। किसी व्यक्ति का चाल-चरित्र उसकी सोच, उसके विचार, उसके कर्म से ही ज्ञात होते हैं। सनातन धर्म, वैदिक संस्कृति में घृणा यानी नफरत और बदला जैसे शब्दों के लिए कोई अवकाश नहीं है। सर्वे भवन्तु सुखिन: और वासुदेव कुटुम्बकम की भावना वैदिक संस्कृति का हिस्सा है। नफरत, बदला- दोनों शब्द केवल दैत्य संस्कृति में ही मिल सकते हैं। मानव सभ्यता और देव सभ्यता में इन दो शब्दों को ढूंढने से भी नहीं पाया जा सकता। मानव जन्म ही प्रेम के कारण हुआ है। मां-शिशु का प्रेम, भाई-बहन, पिता-पुत्री, भाई-भाई, माता-पुत्र- अर्थात पूरे मानव समाज में प्रेम ही प्रमुख तत्व है। प्रेम ही है जिससे बंधे तारे-ग्रह एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होकर शताब्दियों से एक-दूसरे के प्रेम में खुशी से नाचते हुए परिक्रमा करते दिखते हैं। प्रेम ही है जो समष्टि के विनाश को अभी तक रोके हुए है, अन्यथा दैत्यों ने तो सृष्टि के विनाश की सारी तैयारियां कर रखी हैं।
पूरी दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है। बारूद तो अंतरिक्ष में भी फैलाने की व्यवस्था आदमखोर दैत्यों ने कर रखी है। नफरत और बदला लेने की भावना दैत्य प्रवृत्ति के लोगों में संभव है। नफरत फैलाने और बदला लेने वाले मनुष्य कहलाने योग्य ही नहीं हैं। धर्म बनाए गए मानव मात्र को सुव्यवस्थित जीवन निर्माण हेतु, भले दैत्य प्रवृत्ति वाले प्रकृति के विपरीत आचरण और व्यवहार कर रहे हों, परंतु जब तक प्रेम का अस्तित्व रहेगा, विनाश असंभव है।
सच ही कहा गया है कि गुदड़ी में लाल पैदा होते हैं। पहला नाम स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री का स्मरण होना स्वाभाविक ही है। गरीबी क्या होती है, उन्होंने अनुभूति की और सादगीपूर्ण जीवन जीया। रामनगर से काशी विद्यापीठ में पढ़ने जाने के लिए उनके पास नौका चलाने वाले को खिवाई देने के लिए दो पैसे नहीं होते थे। लेकिन शिक्षा की ललक और देश के लिए कुछ अच्छा कर गुजरने की ख्वाहिश में वे गंगा तैरकर जाते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद फटे कुर्ते के ऊपर कोट पहनकर गए थे। गुमान नहीं रहा कभी प्रधानमंत्री बनने का। चाहते तो वे भी जनता के पैसों का दुरुपयोग करके कई ड्रेस बदल सकते थे।
उन्हें देश की गरीब जनता दिखती थी, खुद की आभा निखारने के लिए कृत्रिमता नहीं। जय जवान, जय किसान का नारा देकर भारत को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने वाले पीएम के समय पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया। उनके व्यक्तित्व का जादू था कि हमारे जांबाज़ सैनिकों ने लाहौर तक जीत लिया। यह था उनके नारे का कमाल। देश में अनाज की कमी हुई, तो चिंतित प्रधानमंत्री शास्त्री ने देशवासियों का आह्वान किया कि हफ्ते में एक दिन भोजन न करें। सबने सहर्ष आज्ञा मानकर पालन किया। आज बहुतेरे शिक्षक ऐसे हैं जिनके दिल में भारत धड़कता है। जहां देश के नामी-गिरामी ट्यूशन क्लासेस चलाने वाले करोड़पति शिक्षक हैं, लेकिन उनके मन में ज्यादा से ज्यादा धनलिप्सा है। देश और देश के गरीबों के लिए उनका हृदय नहीं धड़कता। लेकिन साधारण परिवार में जन्म लेने वाले बस्ती जैसे गरीब जिले में पैदा हुए फैजल खान का दिल बचपन से ही गरीबों के लिए धड़कने लगा था। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बी.एससी. के बाद एम.ए. करने वाले मेधावी छात्र को करोड़ों के पैकेज मिले। चाहते तो वे नौकरी करके आलीशान जिंदगी गुजार देते, लेकिन तब जिन गरीबों के लिए उनका दिल धड़कता था, उनको उन्नति के मार्ग पर नहीं ले जा पाते। चालीस रुपए की नौकरी करने के बाद गरीबों के लिए उन्होंने ग्लोबल कोचिंग सेंटर पटना में खोला। एक ओर जहां तमाम कोचिंग वाले कई-कई लाख एक कोर्स का लेते हैं, वहीं पटना ही नहीं अब दुनिया के मशहूर खान सर ने गरीब छात्रों के लिए बेहद मामूली फीस रखी। अनेक कोर्स की शिक्षा देने लगे। बिहार की धरती पर आकर शिक्षा की ज्योति जलाने वाले खान सर उन बच्चों की फीस माफ कर दिए हैं जो वास्तव में चंद हजार फीस भी देने में असमर्थ हैं। बिहार में शायद ही कोई ऐसा पुलिस थाना होगा जहां खान सर के पढ़ाए छात्र पुलिस अधिकारी नहीं हों। आर्मी, नेवी, एयरफोर्स हो या अन्य विभाग, हर जगह खान सर के छात्र ऊंचे पदों पर बैठे हैं। शादी करने के बाद उन्होंने वेडिंग सेरेमनी अपने हजारों छात्रों के साथ मनाई। नाना प्रकार के व्यंजन बनवाए और खुद अपने हाथों से भोजन परोसा। ट्रेडिशन का ख्याल रखते हुए अपनी पत्नी को घूंघट में आने दिया। उनकी छात्राएं हजारों की संख्या में उन्हें राखियां बांधती हैं। खुद खान सर उनका धर्म पूछने पर बताते हैं। मेरे माथे पर तिलक, हाथों में कलावा। खुद बताते हैं कि धर्म मानवता है। वे किसी भी धर्म की बुराई नहीं करते। नफरत जैसा शब्द उनके शब्दकोश में है ही नहीं। बस प्यार बांटते रहते हैं। कई जगह कोचिंग सेंटर होने के बाद भी, माध्यम शहरों के छात्रों के लिए यूट्यूब से ऑनलाइन भी परीक्षा की तैयारी कराते हैं। जिस तरह राजनीति में लालू प्रसाद यादव अपनी ठेठ बोली में संबोधन करने के कारण बिहार में लोगों को प्रिय लगते हैं, उसी तरह खान सर सरल देहाती शब्दों का प्रयोग कर कठिन से कठिन प्रश्नों के उत्तर देने में ख्यात हैं। ऐसा नहीं है कि खान सर के जीवन में परेशानी नहीं आई। जब दिल्ली में बड़े ट्यूशन क्लास की लाइब्रेरी में पानी भरा, तो खान की भी कोचिंग पर ताला लगा था। खान सर की ऊंचाई का ही परिणाम है कि अपने प्रोग्राम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में सदी के नायक अमिताभ बच्चन ने झुककर खान सर को प्रणाम किया था। स्पष्टवादी खान सर शासन की भी आलोचना करने में पीछे नहीं हटते। अपने छात्रों के न्याय हेतु सड़क पर उतर चुके हैं। ‘फिजिक्स वाला’ के नाम से विख्यात अलख पाण्डेय भी उनका सम्मान करते हैं। उनके हरेक फंक्शन में पाण्डेय सर की उपस्थिति इस बात की गवाह है। पंजाब की तबाही वाली बाढ़ को देखकर खान सर ने चालीस टन अनाज बाढ़ पीड़ितों के लिए भेजा। यह बताता है जनता के प्रति वे कितने संवेदनशील हैं।
शिक्षा क्षेत्र में नाम करने वाले खान सर ने विदेश से दो सौ मशीनों का ऑर्डर दिए जाने पर, डायलिसिस मशीन बनाने वाले ने उनसे पूछा कि क्या आप एमबीबीएस हैं? तो उन्होंने अपना परिचय देते हुए गरीब जनता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के अस्पताल खोलने की—वह भी बिहार के हर जिले में प्रतिबद्धता जताई, जो अत्यंत प्रशंसनीय है। भारत में निवास करने वालों की जीवन रक्षा करना राज्य यानी शासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है, लेकिन जब सरकार सब कुछ प्राइवेट हाथों में सौंप रही हो, तो उससे प्राण रक्षा की अपेक्षा रखना बेमानी हो जाता है। ऐसे में खान सर का मात्र 35 रुपए में गरीबों का इलाज करने की योजना उन लुटेरे, कफ़न-खसोट करने वाले हॉस्पिटल मालिकों के मन में चिंता उठाना स्वाभाविक है। शायद यही कारण है कि पटना स्थित खान सर के हॉस्पिटल पर पत्थर मारकर शीशे तोड़ दिए गए। महंगी टाइल्स उखाड़ ली गईं। लेकिन कहावत है- प्रतिरोध और झंझावातों में जो अडिग खड़े रहते हैं, वे हिम्मत नहीं हारते, सफलता की सीढ़ियां चढ़ते जाते हैं।
शिक्षा के बाद चिकित्सा क्षेत्र के लिए खान सर देश-विदेश के नामी-गिरामी बड़े डॉक्टरों से संपर्क साधकर अपने अस्पताल में सेवा देने के लिए ढाई से तीन करोड़ रुपए देने का एग्रीमेंट कर चुके हैं। खान सर की गरीबों की सेवा भावना का ज्ञान होता है। ज्ञात हुआ है कि खान सर शिक्षा, चिकित्सा में बहुत कुछ कर गुजरने के उपरांत कृषि क्षेत्र में भी अतुलनीय करने की योजना बना रहे हैं। भला ऐसे महान व्यक्ति के लिए प्रशंसा के शब्द हृदय से क्यों नहीं निकलेंगे?

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