
मुंबई। देश में हर वर्ष लगभग 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न हो रहा है, जिसमें से करीब 40 प्रतिशत नदियों, नालों और भूमिगत स्तर तक पहुंचकर पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। गुरुवार को इस बढ़ते संकट पर चिंता जताते हुए राज्यपाल ने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, मत्स्य व्यवसाय और पर्यटन के लिए भी बड़ा खतरा बन गया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा ‘प्लास्टिक उत्पादों और प्लास्टिक पैकेजिंग के पर्यावरण पर दुष्प्रभाव’ विषय पर मुंबई में आयोजित विशेषज्ञों की बैठक को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि स्वच्छ जल और स्वच्छ पर्यावरण के बिना विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और उसके उपयुक्त विकल्पों की खोज करना समय की मांग है। साथ ही कॉर्पोरेट क्षेत्र, उद्योग जगत, नीति-निर्माताओं और समाज के सभी वर्गों को मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
“सततता के बिना विकास नहीं”
राज्यपाल ने कहा कि “सततता के बिना विकास को विकास नहीं कहा जा सकता” और प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार, उद्योग और नागरिकों के संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं में जागरूकता बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया।
हर जगह फैल चुका है प्लास्टिक
इस मौके पर बालकृष्ण पिसुपति ने कहा कि आज प्लास्टिक सर्वव्यापी हो चुका है—हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर समुद्र की गहराइयों तक। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “आपका पहला टूथब्रश आज भी कहीं जमीन में पड़ा हुआ है,” जो प्लास्टिक के दीर्घकालिक प्रभाव को दर्शाता है।
सतत वित्त से पर्यावरण संरक्षण
भारतीय रिज़र्व बैंक के कार्यकारी निदेशक आर. केशवन ने बताया कि बैंक की ‘सस्टेनेबल फाइनेंस’ योजना के तहत पर्यावरण संरक्षण को वित्तीय सहयोग दिया जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल के हाथों ‘वर्क इन प्रोग्रेस: रेड्यूसिंग द प्लास्टिक फूटप्रिंट ऑफ प्रॉडक्ट्स एंड पैकेजिंग’ रिपोर्ट का विमोचन भी किया गया। बैठक में विभिन्न कॉर्पोरेट कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, मुख्य स्थिरता अधिकारी और पर्यावरण विशेषज्ञ बड़ी संख्या में उपस्थित रहे




