
आने वाला समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का होगा- यह कहना अतिशयोक्ति नहीं माना जा सकता। जिस गति से एआई तकनीक विकसित हो रही है, उससे स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में इसका विस्तार कई गुना बढ़ेगा और जीवन के लगभग हर क्षेत्र पर इसका प्रभाव दिखाई देगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, परिवहन, प्रशासन, नीति-निर्माण, विज्ञान, इतिहास, संस्कृति और सामान्य नागरिकों के दैनिक कामकाज तक- एआई धीरे-धीरे एक केंद्रीय भूमिका निभाने जा रही है। भारत अभी एआई के क्षेत्र में अमेरिका और चीन जैसे अग्रणी देशों की श्रेणी में नहीं आता, लेकिन देश में एआई प्रतिभाओं की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। उद्योग जगत में एआई निवेश को प्राथमिकता दी जा रही है और बड़ी संख्या में कंपनियां इसे भविष्य के प्रमुख कौशल के रूप में देख रही हैं। बड़ी बात यह है कि भारत ने एआई विकास के लिए लोग (People), ग्रह (Planet) और प्रगति (Progress) जैसे मानवीय एवं नैतिक सिद्धांतों को आधार बनाने की दिशा दिखाई है, जो तकनीक को सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी संतुलित बनाने का प्रयास है। दिल्ली में आयोजित बहु-दिवसीय एआई शिखर सम्मेलन को वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। इसमें विभिन्न देशों के प्रतिनिधि, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रमुख और तकनीकी विशेषज्ञ भाग लेकर एआई के भविष्य, उसके दायरे और उसके सामाजिक प्रभावों पर चर्चा कर रहे हैं। यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नई तकनीकों पर इतना व्यापक और बहुआयामी विमर्श पहले कम ही देखने को मिला है। एक समय था जब कंप्यूटर के आगमन को लेकर आशंकाएं थीं कि मशीनें मानव का स्थान ले लेंगी, लेकिन समय के साथ यह तकनीक मानव जीवन का सहायक उपकरण बन गई। एआई को लेकर भी आज यही बहस चल रही है- क्या यह मानव का विकल्प बनेगी या मानव क्षमताओं को और मजबूत करेगी? भारत में एआई का उपयोग कई क्षेत्रों में शुरू हो चुका है। स्वास्थ्य सेवाओं में डिजिटल मिशनों के साथ एआई को जोड़कर रोग पहचान को अधिक सटीक बनाया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास भारतीय बोलियों और भाषाओं पर काम कर रहा है, ताकि ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को स्थानीय भाषा में शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके। कृषि क्षेत्र में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रोपड़ द्वारा विकसित एआई-आधारित स्वचालित मौसम स्टेशन जैसे प्रयोग किसानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। कम लागत वाले उपकरण सिंचाई, फसल योजना और कीट प्रबंधन जैसी सलाह उपलब्ध करा सकते हैं, जिससे कृषि उत्पादकता में सुधार की संभावना है। इसके अलावा भारत में एआई से जुड़े कई राष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं, जिनका उद्देश्य केवल उद्योग नहीं बल्कि संस्कृति, इतिहास और भाषाई विरासत को भी तकनीक से जोड़ना है।
हालांकि अवसरों के साथ कई गंभीर चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। एआई के विकास की सबसे बड़ी बाधाओं में उन्नत चिप (जीपीयू) की उपलब्धता और लागत शामिल है। ये चिप्स अत्यंत महंगे होते हैं और बड़ी मात्रा में ऊर्जा की खपत करते हैं। डाटा केंद्रों की बढ़ती संख्या के कारण बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे ऊर्जा अवसंरचना पर दबाव बढ़ने की संभावना है। अमेरिका वर्तमान में चिप निर्माण और एआई तकनीक में अग्रणी बना हुआ है, जबकि चीन भारी निवेश के साथ तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। भारत अभी इस दौड़ में शुरुआती अवस्था में है और घरेलू चिप निर्माण तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में लंबा रास्ता तय करना बाकी है। कुल मिलाकर, एआई एक ऐसी तकनीक है जो आने वाले वर्षों में मानव जीवन की संरचना को गहराई से प्रभावित करेगी। भारत के सामने दोहरी चुनौती है- एक तरफ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खुद को स्थापित करना और दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना कि तकनीक का उपयोग मानवीय मूल्यों, रोजगार और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाए। यदि नीति, निवेश, ऊर्जा संसाधन और कौशल विकास के बीच सही संतुलन बनाया गया, तो भारत केवल एआई उपभोक्ता देश नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण वैश्विक नवाचार केंद्र के रूप में उभर सकता है।




