
मेरे देश का मिज़ाज पूरी तरह बदल गया है। सनातन धर्म के उद्घोष- “सर्वे सन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्” यानी सभी के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना- आज भी हमारे सांस्कृतिक मूल में हैं। इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की परिकल्पना की गई, जिसमें समूची मानवता को एक परिवार माना गया। हर प्राणी के प्रति प्रेम, सम्मान और समान व्यवहार—यही शाश्वत परंपरा की पहचान रही है। लेकिन आज यह आरोप और चिंता बार-बार सामने आती है कि राजनीतिक लाभ के लिए इन मूल्यों को पीछे छोड़ दिया गया है। झूठ, अतिशयोक्ति और भावनात्मक मुद्दों का सहारा लेकर जनमत को प्रभावित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कहा जाता है कि जब झूठ लगातार दोहराया जाता है तो वह सच जैसा प्रतीत होने लगता है, और यही स्थिति आज कई लोगों को चिंतित करती है। संत परंपरा में भी इस प्रवृत्ति की आलोचना मिलती है। कबीर ने कहा था— “साँच कहूं तो मारन धावे, झूठे जग पतियाना”—अर्थात सत्य बोलना कठिन है, क्योंकि समाज अक्सर झूठ को ही स्वीकार कर लेता है। आज भी यह पंक्ति कई लोगों को प्रासंगिक लगती है, जब वे राजनीति और सार्वजनिक जीवन में मूल मुद्दों के हाशिये पर जाने की बात करते हैं। यह अपेक्षा की जाती है कि संसद में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस हो। टेलीकॉम क्षेत्र का उदाहरण अक्सर दिया जाता है- जहां 28 दिन के रिचार्ज चक्र को लेकर उपभोक्ताओं के हितों पर सवाल उठते हैं। पहले आजीवन इनकमिंग जैसी सुविधाएं थीं, लेकिन प्रतिस्पर्धा कम होने के बाद उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ने की शिकायतें सामने आती हैं। सड़क, पुल और बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठते हैं—निर्माण के तुरंत बाद खराब होने वाली परियोजनाएं जनविश्वास को प्रभावित करती हैं। इसी तरह खाद्य और पेय उत्पादों की गुणवत्ता, निजीकरण, और संसाधनों के वितरण जैसे मुद्दे भी आम नागरिक के जीवन से सीधे जुड़े हैं। कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा इन मुद्दों को उठाने की चर्चा होती है, जैसे राघव चड्ढा, लेकिन साथ ही यह आरोप भी सामने आते हैं कि राजनीतिक दलों के भीतर मतभेद और दबाव के कारण कई आवाजें कमजोर पड़ जाती हैं। अरविंद केजरीवाल की भूमिका को लेकर भी समर्थकों और आलोचकों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। आज की राजनीति में एक बड़ी चिंता सामाजिक विभाजन को लेकर भी व्यक्त की जाती है—जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर समाज के बंटने की बात कही जाती है। आलोचकों का मानना है कि इससे वास्तविक मुद्दे- जैसे बेरोजगारी, शिक्षा और आर्थिक असमानता—पिछड़ जाते हैं। युवा शक्ति, जो किसी भी देश का भविष्य होती है, उसके बारे में भी यह चिंता जताई जाती है कि वह व्यक्ति-पूजा या पहचान की राजनीति में उलझकर मूल सवालों से दूर हो रही है। बेरोजगारी, कृषि संकट और आर्थिक अवसर जैसे विषय उतनी प्रमुखता से नहीं उठ पा रहे, जितनी अपेक्षित है। नेपाल का उदाहरण भी कुछ लोग देते हैं, जहां हाल के वर्षों में राजनीतिक बदलाव और प्रशासनिक सुधारों की चर्चा हुई। नेपाल में शासन और सार्वजनिक अनुशासन से जुड़े कुछ कदमों को परिवर्तन के रूप में देखा जाता है, हालांकि हर देश की परिस्थितियां अलग होती हैं और सीधे तुलना करना हमेशा सरल नहीं होता। आज के समय में सबसे बड़ी जरूरत संतुलित दृष्टिकोण और जागरूक नागरिकता की है। समाज में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है, लेकिन संवाद का आधार तथ्य, तर्क और आपसी सम्मान होना चाहिए। राजनीति का उद्देश्य यदि जनकल्याण और समान अवसर सुनिश्चित करना है, तो जरूरी है कि बहसें वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित हों—शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, और सामाजिक न्याय पर। साथ ही, नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे सूचनाओं को परखें, सवाल पूछें और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदारी निभाएं। अंततः, किसी भी राष्ट्र की दिशा उसके नागरिकों की सोच, संवाद और निर्णयों से तय होती है—और यही वह बिंदु है, जहां से परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है।




