Thursday, February 19, 2026
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संपादकीय: संसद में गूंजे नारे: “वोट चोर गद्दी छोड़”!

संसद में “वोट चोर गद्दी छोड़” के नारे गूंजे। ईवीएम हैक के खिलाफ वर्षों से जनता, विपक्षी नेता, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट्स और एनजीओ मांग करते आए हैं कि ईवीएम बैन कर बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। दो केस सुप्रीम कोर्ट के सामने लाए गए। पहला मामला चंडीगढ़ मेयर चुनाव में ऑफिसर द्वारा सीसीटीवी फुटेज में आम आदमी पार्टी प्रत्याशी के वोट कैंसिल कर बीजेपी को जिताने का था। सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी पार्टी प्रत्याशी को मेयर बना दिया। दूसरा मामला हरियाणा के सरपंच चुनाव का था, जहां ईवीएम काउंटिंग में धांधली हुई और रिकाउंटिंग में हारा हुआ प्रत्याशी जीत गया। सुप्रीम कोर्ट ने यहीं चूक की। दोनों जगह गड़बड़ी करने वालों को जेल भेज देता, सजा दे देता तो चुनाव आयोग द्वारा बार-बार ईवीएम में हेराफेरी की हिम्मत नहीं होती।
दंडित नहीं किए जाने के कारण चुनाव आयोग उत्साहित हो गया और दूसरे राज्यों में गड़बड़ी कर अप्रत्याशित रूप से बीजेपी को जिताने के लिए वोटर लिस्ट में हेरफेर करने लगा। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अंतिम घंटे में लाखों पड़े वोट ने चुनाव परिणाम बदल दिया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि बीजेपी नेताओं के घरों में कई दर्जन वोट बढ़ाए गए। जीत के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के लोगों को घुसपैठिया बताकर सरकारी जमीन पर बने उनके चालीस साल पुराने घर बुलडोजर से तोड़ डाले गए, वह भी भरी बरसात में। मकान मालिकों के अनुसार उनसे मकान का टैक्स लिया जाता रहा था। मानवता और नैतिकता का तकाजा था कि भले ही मकान सरकारी जमीन पर बने हों, लेकिन गृहकर देने के कारण उन्हें अवैध नहीं कहा जाना चाहिए था। वैकल्पिक आवास की व्यवस्था कर मकान तोड़े जाने चाहिए थे, लेकिन बीजेपी सरकार को गरीबों का विपक्षी दलों को वोट देना अखर रहा था। इसलिए वोट बेस काटने के लिए राजनीतिक फैसला लिया गया और भारतीय नागरिकों को खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर कर दिया गया। मुंबई में ऐसे तमाम बिल्डिंगें हैं जो अवैध हैं, लेकिन उनसे शुल्क लेकर नियमित कर दिया गया। तो दिल्ली में ऐसा क्यों नहीं हुआ? अब बिहार के 65 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए। चुनाव आयोग के अनुसार सारे लोग मृत या दूसरे स्थान पर चले गए हैं। कांग्रेस नेता और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुखर होकर बिहार में वोट चोरी का मामला उजागर किया कि “मुर्दे बिहारी लोगों ने उनसे मिलकर चाय पी।” मुर्दों के साथ चाय पीने वाले राहुल गांधी को मोदी सरकार देशद्रोही बताने लगी। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में वही लोग हाजिर हो गए जिन्हें मृत बताया गया था। चुनाव आयोग जो बिहार में काटे गए 65 लाख लोगों की लिस्ट नहीं दे रहा था, सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए उनके जिलों में सूची सार्वजनिक करने का निर्देश दिया। डेढ़ दर्जन मृत बताए गए लोग सुप्रीम कोर्ट में जीवित उपस्थित हुए। चुनाव आयोग ने SIR अभियान के अंतर्गत मात्र 15 दिनों में आठ करोड़ वोटर्स वेरिफिकेशन का आदेश दिया था, जिसे पूरा करने के लिए बीएलओ घर-घर न जाकर कमरे में बैठकर वोट चोरी का काम करने लगे। यह खुफिया कैमरे में कैद कर आज़ाद पत्रकारों द्वारा वायरल किया गया, जिन पर सरकार ने एफआईआर दर्ज कराई। कई स्वतंत्र पत्रकार इस कार्य में चुनाव आयोग के झूठ का पर्दाफाश कर रहे हैं और नित नए खुलासे सामने ला रहे हैं। आधार कार्ड को चुनाव आयोग ने फर्जी करार देकर उसे निवासी होने का प्रमाण मानने से इनकार कर दिया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने हिम्मत दिखाते हुए आधार कार्ड जोड़कर ऑनलाइन वोटर बनने का आदेश दिया। एक बात समझ में नहीं आती कि मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने जिस आधार कार्ड को शोषण का जरिया कहा था, उसी आधार कार्ड को हर जगह अनिवार्य कर दिया, जबकि चुनाव आयोग उसे भारतीयता का सबूत नहीं मान रहा। बीजेपी का दोहरा चरित्र उजागर हो चुका है। इसीलिए वोट चोरी के कारण बिहार की जनता को जागरूक करने के लिए राहुल गांधी और तेजस्वी यादव “वोट चोरी यात्रा” पर निकल चुके हैं। कई दिन हो चुके हैं, फिर भी जनता उन्हें बड़ी मात्रा में समर्थन दे रही है। बिना बुलाए जनता की भीड़ उनकी रैलियों में शामिल हो रही है। मेनस्ट्रीम मीडिया चुप है। वह राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की रैलियों की चर्चा तक नहीं कर रहा। इसी बीच नरेंद्र मोदी की भी एक रैली आयोजित की गई, जिसे सुनने के लिए कोई आने को तैयार नहीं था। तब सरकारी स्कूलों में छात्रों को धमकाया गया कि रैली में नहीं जाओगे तो परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा। ऑन कैमरा छात्रों ने मोदी की रैली की पोल खोलकर रख दी। चुनाव आयोग छटपटा रहा कि क्यों उसने इतनी बड़ी संख्या में बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया। अहम बात यह कि राहुल गांधी की इस रैली का प्रभाव गुजरात आदि राज्यों में भी पड़ रहा है, जहां खुद जनता सड़कों पर उतर चुकी है। देखते-देखते “वोट चोर गद्दी छोड़” का नारा पूरे देश में गूंजने लगा है। सारी दुनिया चुनाव आयोग और बीजेपी सरकार के इस अलोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतने पर नजर गड़ाए हुए है। देश बदनाम हो रहा है। लोकतंत्र कलंकित हो रहा है। सोशल मीडिया में बीजेपी समर्थक इसे सत्ता परिवर्तन करने का विदेशी षड्यंत्र बता रहे हैं। वे तुलना कर रहे हैं पाकिस्तान में सेना की सहायता से प्रधानमंत्री बने इमरान खान और बांग्लादेश में विपक्षी दलों द्वारा चुनाव बहिष्कार के बावजूद शेख हसीना सरकार के सत्ता में आने के बाद छात्र आंदोलन के कारण शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़ने की घटना से। वे मान रहे हैं कि बीजेपी सरकार चुनाव आयोग पर दबाव डालकर ईवीएम में हेराफेरी और जीवित वोटरों को मृत घोषित कर उनके नाम काटकर किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना चाहती है। बिहार में जीवित मतदाताओं के नाम जुड़ने के कारण अब बीजेपी सरकार और चुनाव आयोग को बेइमानी का दूसरा पैंतरा आज़माना पड़ेगा। यह भूलना मूर्खता होगी कि बिहार की भूमि क्रांति की भूमि है। यहीं से बौद्ध धर्म चलकर आधी दुनिया में फैला। यहीं से महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन किया। परिणाम दुनिया जानती है।

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