
वरिष्ठ लेखक- जितेंद्र पांडेय
सबसे पहले बात स्वतंत्रता दिवस की। दुनिया जानती है कि भारत को ब्रिटिश गुलामी से छुटकारा 15 अगस्त 1947 को आधी रात में मिला था। बीजेपी कहती है, आजादी तो 2024 में श्रीराम की मूर्ति स्थापना के साथ मिली है।
अर्ध रात्रि में दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराते हुए अंतरिम सरकार के मुखिया स्व. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, आज जब सारी दुनिया सो रही है, भारत जागकर आजादी का जश्न मना रहा है। अंत में उन्होंने कहा था, हमें सबसे पीछे खड़े भारतीय की आंखों से बहने वाले आंसू पोंछने हैं।
अंग्रेज अवश्य चले गए, लेकिन एक निर्धन और संसाधनहीन भारत छोड़ गए। कुछ नहीं छोड़ा उन्होंने यहां। जो लोग मुगलों को लुटेरा कहते हैं, उन्हें बताना चाहिए कि मुगल लूटकर कहां ले गए। उनकी बनाई गई इमारतें आज भी सही-सलामत हैं। लालकिला भी मुगलों का ही बनवाया है, जहां वर्ष में दो बार तिरंगा बड़ी शान से फहराया जाता है, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के द्वारा। देश में कंगाली का अंधेरा था, जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए। दूरदर्शी नेहरू ने ज्ञान के लिए यूनिवर्सिटी खोले, विज्ञान के लिए IIT, IIM, एम्स बनवाए। भाखड़ा नांगल बांध, हीराकुंड और रिहाद बांध बनवाए। इसरो, डीआरडीओ, भाभा परमाणु केंद्र नेहरू की ही देन है। निर्धन राष्ट्र की चतुर्दिक उन्नति के लिए वही कार्य कर सकता है, जो जनहित चाहता हो, जिसके मन में जनता बसती हो। उन्होंने कभी भी धर्म का आडंबर नहीं किया। भाखड़ा नांगल बांध देश को समर्पित करते हुए उसे मंदिर कहा, जैसे महामना मदन मोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय निर्माण के बाद शिक्षा का मंदिर कहा था। भौतिक गुलामी हमें अंग्रेजों से मिली थी। नेहरू, गांधी जैसे हजारों नेता बार-बार जेल गए। शहीद भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद जैसे युवकों ने सशस्त्र क्रांति का सहारा लिया। आज बीजेपी सरकार उन भारत मां के शहीद सपूतों का नाम नहीं लेती। उनको जानना हो तो उनके लेख पढ़ें, आजादी के बाद भारत में कैसी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था बनानी होगी, पूरा खाका खींचा था उन्होंने। नेताजी सुभाषचंद्र बोस का नाम तब लिया जाता है, जब नेहरू को नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर ज्ञान दिया जाता है, तो पूछा जाता है, आजादी चरखे से आई? महात्मा ऐसी शख्सियत का नाम है, जिन्हें राष्ट्रपिता नाम नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अपने पत्र में, जो महात्मा गांधी को लिखा था, राष्ट्रपिता नाम से संबोधित किया था। अंग्रेजों ने नमक पर टैक्स लगाया था, तब सैकड़ों मील दूर की यात्रा कर वे अन्य लोगों के साथ समुद्र किनारे पहुंचे और बिना टैक्स दिए एक मुट्ठी नमक उठा लिया। तब उनके साथ दांडी यात्रा में गई स्वर कोकिला सुश्री सरोजिनी नायडू ने घोषणा कर दी, लो नमक कानून टूट गया। गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को पूजने वाले देश में गांधी को गाली देते हैं। कहते हैं, गांधी फिल्म बनने के बाद लोग गांधी को जानने लगे, लेकिन वहीं जब विदेश जाते हैं, तो बापू जी की मूर्ति पर पुष्प चढ़ाते हैं। वासुदेव कुटुंबकम् की बात करते हैं। गोडसे बड़े मर्द थे, तो मुहम्मद अली जिन्ना को मार देते, पाकिस्तान ही नहीं बनता। अंग्रेज गवर्नर को मार देते, तो देश के युवाओं के आदर्श बन जाते। गोडसे में सरदार उधम सिंह जैसा कलेजा नहीं था, जिन्होंने इंग्लैंड जाकर अंग्रेज अधिकारी को खुलेआम गोली मार दी थी। एक जर्जर बूढ़े व्यक्ति की हत्या करना कौन सी बहादुरी हो गई? महात्मा गांधी को गोली मारकर भले शरीर खत्म कर दिया गया, लेकिन यह भूल गए कि गांधी हाड़-मांस का पुतला नहीं, आदर्श विचार है जिसे कभी मारा नहीं जा सकता। दक्षिणी अफ्रीका को आजादी दिलाने वाले नेल्सन मंडेला ने गांधी विचार का आजीवन पालन किया। अंग्रेजों के खिलाफ शस्त्र नहीं उठाए। महात्मा के सत्य-अहिंसा का पालन करते हुए 27 साल जेल में बिताया। तब अंग्रेजों को उनके आगे झुकना पड़ा, दक्षिणी अफ्रीका को आजाद करना पड़ा था। गांधी बनना आसान कहां है। बिहार के चंपारण में गरीबी देखकर गांधी जी ने केवल एक धोती पहनने का निश्चय किया। उनके पिता धनवान थे। वे खुद इंग्लैंड जाकर कानून की पढ़ाई कर बैरिस्टर बने थे। साउथ अफ्रीका में भारतीय व्यापारी के पक्ष में वकालत कर कानून से मुक्ति दिलाने वाले महात्मा गांधी चाहते, तो भारत या कहीं भी वकालत करके राजाओं जैसा जीवन बिता सकते थे। आत्मविश्वास तो देखिए, जब इंग्लैंड के राजा ने पूछा, गांधीजी क्या आपके पास कपड़े नहीं हैं, तो मंगवा देता हूं। तब शालीनता के साथ उत्तर देते हुए कहना, भारतीयों के वस्त्र तो आपने छीन लिए हैं। ब्रिटेन के राजा के शासन में खड़े होकर, उसी पर दोष लगाने के लिए कितनी हिम्मत चाहिए, वह गांधी ही कर सकते थे। यह कहा जाता है कि पहले चुनाव लड़ने के बाद सरदार पटेल प्रधानमंत्री बनते तो ऐसा होता, वैसा होता, कहने वाले मूर्ख नहीं तो और क्या हैं? देश में पहला आम चुनाव 1951/52 में लंबी अवधि तक चला था। परंतु सरदार पटेल तो चुनाव से एक साल पूर्व ही 1950 में मृत्यु हो चुकी थी, फिर प्रधानमंत्री कैसे बनते? देश के अमर शहीद क्रांतिकारियों ने संविधान की रूपरेखा लिखी थी, जिसमें सभी को समानता, सद्भावना, एकता जैसे शब्द थे। लगभग वही सारी चीजें भारतीय संविधान की आत्मा हैं। दावे बड़े किए जाते हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने की कोशिश नहीं। बंटवारे के लिए गांधी, नेहरू कभी भी जिम्मेदार नहीं थे। जिन्ना की पाकिस्तान मांग के दो दिन पूर्व ही हिंदू महासभा ने अहमदाबाद के अपने अधिवेशन में दो कौम, दो राष्ट्र के प्रस्ताव पारित किए थे। संभव है, अंग्रेजों की सहमति से ही प्रस्ताव पारित किया गया हो। बंटवारे के समय धनवान, शिक्षित हिंदू पाकिस्तान से भारत आ गया और वहीं श्रेष्ठ वर्ग का मुसलमान पाकिस्तान चला गया। शेष गरीब हिंदू पाकिस्तान में और गरीब मुसलमान भारत में रह गए। लगभग दस लाख हिंदू-मुस्लिम मारे गए, जिसके लिए और अधिक खून न बहे और अधिक हत्याएं न हों, के लिए जो जहां रहना चाहे, रहे की संधि की गई थी। पीओके को नेहरू की देन बताने वाले शायद इतिहास की सत्यता से दूर भागते हैं। सरदार पटेल ने सैकड़ों राजाओं, नवाबों को प्यार अथवा भय से भारत में मिलने का कार्य किया। जम्मू-कश्मीर में डोगरा राजा हरि सिंह थे, परंतु अधिक आबादी मुस्लिम थी। राजा हरि सिंह कभी पाकिस्तान, तो कभी भारत में मिलने या फिर आजाद रहने के ऊहापोह में फंसे थे। जब पाकिस्तानी सेना अंग्रेज सेनापति के निर्देशन में जम्मू-कश्मीर पर काबीलों के वेष में हमला कर दो-तिहाई कश्मीर पर कब्जा कर लिया, तब हरि सिंह ने भारत से सेना भेजने की गुहार लगाई, लेकिन सरदार पटेल ने मना कर दिया और कहा, किस अधिकार से हम सेना भेजें? विकल्प बस यही है कि आप भारत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर करें। हुआ वही। तब तक बड़ी देर हो चुकी थी। सरदार पटेल ने सेना भेज दी। भयानक मारकाट हुई। भारतीय सेना के पास गोला-बारूद था ही नहीं, इसलिए कार्यकारी भारत सरकार ने सामूहिक निर्णय लिया, युद्ध बंद करने की घोषणा का। यह अकेले नेहरू द्वारा लिया गया फैसला नहीं था। सामूहिक फैसला था। भले ही नेहरू के खिलाफ जहर उगलकर नेहरू को दोषी ठहराने की साजिश करके जनता में भ्रम फैलाया गया हो। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विषय में भी देश में भ्रांति फैलाने का कुचक्र रचा और कहा गया कि नेहरू ने लिखित रूप से अंग्रेज सरकार को दिया कि नेताजी जब भी जीवित अथवा मृत मिलेंगे, अंग्रेज सरकार को सौंप दिया जाएगा। इतना तय है कि यदि ऐसा कोई पत्र लिखा ही नहीं गया। बाद में नेताजी की मृत्यु प्लेन हादसे में उड़ाई गई थी और नेताजी रूस पहुंच गए थे। भारतीय जांच में यही सत्य पाया गया, लेकिन रूस के साथ संबंध खराब न हों, आगे की जांच रोक दी गई। जहां तक पीओके लेने का सवाल है, आज जब सेना ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया था, बढ़त बना ली थी, सेना के हाथ बांध दिए गए थे कि पाकिस्तानी सेना को निशाना नहीं बनाया जाए। अगर सचमुच सेना को खुली छूट होती, तो इस बार भारतीय सेना पीओके पर कब्जा कर चुकी होती। पाकिस्तान और भारतीय सेना की आज तुलना ही नहीं की जा सकती। सेना को पीओके लेने से रोक दिया। यही सीजफायर जिसे ट्रंप अपने द्वारा कराया गया कहता है, चार दिन बाद किया गया होता तो सेना का लक्ष्य पीओके लेना ही होता और निश्चित ही हमारी बहादुर सेना पीओके पर तिरंगा फहरा चुकी होती। संसद में रक्षा मंत्री साफ-साफ झूठ बोले कि हमारे सैनिक मरे नहीं और न ही जनता मारी गई। सच तो यह है कि जैसा कि हमारी सेना के शीर्ष ने कहा, सीजफायर के बाद पाकिस्तान ने पूंछ सेक्टर पर गोलाबारी भयानक रूप से की, जिसमें हमारे दस सैनिक शहीद हुए और कई नागरिक मारे गए। शहीद भगत सिंह ही नहीं, गांधी, नेहरू, पटेल- कोई भी राजनीति में धर्म मिलाने की बात नहीं कही। भगत सिंह तो खुद को नास्तिक कहते रहे। शायद इसी कारण सरकार और बीजेपी भूलकर भी देश के क्रांतिकारियों का नाम तक नहीं लेती। इतना निश्चित है कि महात्मा गांधी चाहते तो लाखों का सूट दिन के पांच बार बदल सकने में समर्थ थे, लेकिन उन्होंने देश की गरीबी अनुभव किया और एक धोती पर शेष जीवन बिता दिया। यह भी कि देश की समस्त तीस करोड़ जनता आजादी की जंग में महात्मा गांधी के एक आह्वान पर तन, मन, धन अर्पित करने को तैयार थी। गांधी ही देश के निर्विवाद नेता थे।