Wednesday, March 11, 2026
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सीजेआई गवई के स्वागत में प्रोटोकॉल की अनदेखी पर विवाद, विपक्ष का फडणवीस सरकार पर तीखा हमला

मुंबई। महाराष्ट्र में महायुति सरकार को उस समय तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ा, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति भूषण गवई ने मुंबई यात्रा के दौरान राज्य प्रशासन द्वारा प्रोटोकॉल का पालन न किए जाने पर सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताई। गवई की यह यात्रा उनके सीजेआई पद ग्रहण के बाद मुंबई की पहली आधिकारिक यात्रा थी, जिसमें राज्य सरकार के शीर्ष अधिकारियों की अनुपस्थिति ने संवैधानिक और सामाजिक स्तर पर बहस छेड़ दी है। मुख्य न्यायाधीश गवई, जो अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं, ने महाराष्ट्र और गोवा बार काउंसिल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में प्रशासनिक उपेक्षा का मुद्दा खुद उठाया। उन्होंने इस बात पर निराशा जताई कि राज्य के मुख्य सचिव, डीजीपी और मुंबई पुलिस आयुक्त जैसे प्रमुख अधिकारी हवाई अड्डे पर स्वागत के लिए मौजूद नहीं थे, न ही उन्हें अपेक्षित सुरक्षा मुहैया कराई गई। इस घटना के बाद विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस विधायक नाना पटोले ने इसे “संवैधानिक और सामाजिक न्याय के मूल्यों का अपमान” बताया और इसे जातिगत पूर्वाग्रह से जोड़ते हुए पूछा, “क्या यह उपेक्षा इसलिए हुई क्योंकि सीजेआई गवई दलित हैं?
पटोले ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को संबोधित पत्र में इस मामले को गंभीर बताते हुए मुख्य सचिव सुजाता सौनिक, डीजीपी रश्मि शुक्ला, और मुंबई पुलिस आयुक्त देवेन भारती के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उन्होंने लिखा, “यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि न्यायपालिका के प्रति अपमान और संवैधानिक व्यवस्था में गहरी असंवेदनशीलता को दर्शाता है। हालांकि, इस विवाद के बीच, बाद में चैत्यभूमि (दादर पश्चिम) में डॉ. बी.आर.अंबेडकर के स्मारक पर सीजेआई गवई की यात्रा के दौरान संबंधित अधिकारियों ने उनसे मुलाकात की, लेकिन तब तक प्रोटोकॉल उल्लंघन का मुद्दा राष्ट्रीय सुर्खियों में आ चुका था। पटोले ने अपने वक्तव्य में इस बात पर जोर दिया कि महाराष्ट्र सरकार को इस गंभीर चूक के लिए स्पष्ट जवाबदेही तय करनी चाहिए, जिससे भविष्य में संविधान के सर्वोच्च संस्थानों के साथ इस प्रकार की उपेक्षा की पुनरावृत्ति न हो। यह प्रकरण अब राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन गया है, जिसमें एक ओर सरकार की लापरवाही पर सवाल खड़े हो रहे हैं और दूसरी ओर दलित नेतृत्व के सम्मान और संवैधानिक संस्थानों की गरिमा के मुद्दे पर बहस तेज हो गई है।

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