
संदीप सिंह गहरवार
मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासन में बीते दिनों एक ऐसा घटनाक्रम हुआ जिसने पूरे राज्य का ध्यान खींचा। भोपाल के एक महत्वपूर्ण इलाके में दशकों से खड़ा अपराध और रसूख का प्रतीक एक आलीशान साम्राज्य अचानक ढह गया। यह सिर्फ ईंट-पत्थरों का मलबा नहीं था, बल्कि उस माफिया संस्कृति का अंत था जिसने कानून को लंबे समय तक अपने पैरों तले कुचल रखा था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की यह कार्यवाही केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी देती है कि “रामराज में खलल डालने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। भोपाल का कुख्यात मछली परिवार लंबे समय से लव जिहाद, नशे का कारोबार और अवैध कब्जों जैसे संगीन आरोपों में घिरा रहा है। मछली गिरोह के नाम से बदनाम यह नेटवर्क राजधानी में राजनीतिक और आपराधिक गठजोड़ का चेहरा माना जाता था। तीन दशक पहले बनी वह कोठी सिर्फ एक इमारत नहीं थी, यह उस नेटवर्क का प्रतीक थी जो कानून से ऊपर खुद को मानता था। इस साम्राज्य की जड़ें इतनी गहरी थीं कि वर्षों तक कोई सरकार खुलकर इस पर हाथ नहीं डाल सकी। लेकिन मौजूदा मोहन सरकार ने यह मिथक तोड़ दिया।
रसूख से मलबे तक
6,000 वर्ग फीट सरकारी भूमि पर बनी मछली की तीन मंजिला कोठी आज के बाजार में 100 करोड़ रुपये से अधिक मूल्यवान थी। प्रशासन ने शारिक मछली और उसके भाइयों को कानूनी नोटिस दिया, दस्तावेज मांगे, लेकिन कोई वैध कागज नहीं मिला। इससे पहले भी प्रशासन ने इनके कारखाने, फार्म हाउस, मदरसे और गोदाम गिराए। कुल मिलाकर अब तक 100 करोड़ रुपये की सरकारी जमीन मुक्त कराई जा चुकी है। मछली परिवार के खिलाफ कार्यवाही सिर्फ एक परिवार के खिलाफ की गई कार्यवाही नहीं है, यह उस मानसिकता के खिलाफ युद्ध है जो मानती है कि सत्ता और रसूख से कानून खरीदा जा सकता है।
अपराधियों के विरुद्ध निर्भीक और निर्णायक
मोहन सरकार की यह कार्यवाही राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी बेहद अहम है। सिर्फ सत्ताधारी दल ही नहीं अब तो विपक्ष पर भी सवाल खड़ा होता है कि दशकों का यह साम्राज्य क्या उनकी नजर में कभी सामने नहीं आया। मछली परिवार पर विपक्ष के तरकश का एक तीर भी कभी सरकार या प्रशासन के लिए कोई लकीर नहीं बना पाया। हालांकि सवाल अभी भी खड़ा हुआ है कि आखिर किसके संरक्षण में अपराध का यह साम्राज्य तीन दशक तक कानून को अपनी जेब में डालकर फला-फूला? इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि अपराध के इस साम्राज्य को नेस्तनाबूद करने का साहसिक कदम मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया है पर तीन दशक से किस राजनेता और किसके राजनीतिक संरक्षण में यह अपनी मिल्कियत बढ़ाता रहा है? मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को उन राजनीतिक आकाओं के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई करनी होगी। मछली परिवार पर यह कार्यवाही कर मोहन सरकार यह छवि गढ़ रही है कि वह अपराधियों के खिलाफ निर्भीक और निर्णायक है। इस गिरोह पर लव जिहाद और नशे की सप्लाई के आरोप थे, इसलिए इसे गिराना सिर्फ कानूनी कार्यवाही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-सामाजिक संदेश भी है।एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, यह बुलडोजर राजनीति की रणनीति है, कानून के नाम पर नैतिक वैधता और राजनीतिक लोकप्रियता दोनों हासिल करना। इस कार्यवाही से अपराधियों को कानून का डर तो दूसरी तरफ जनता का भरोसा कायम रखने की कोशिश की गई है। इस कार्यवाही से सामान्य जनता का भरोसा बढ़ा है। लोगों को लगा कि कानून का राज लौट रहा है। जबकि माफियाओं में खौफ पैदा कर यह संदेश गया कि अब रसूख, धर्म या धन से कोई बचाव नहीं होगा।
क्या खत्म हो पाएगा मध्यप्रदेश से माफिया नेटवर्क
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बुलडोजर कार्रवाई अपराध रोकने का अंतिम उपाय नहीं हो सकती। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी कहते हैं, बुलडोजर कानून नहीं है, परंतु अपराधियों को संकेत देने का एक तरीका जरूर है। लेकिन असली सुधार पुलिसिंग और न्यायिक प्रक्रिया में होना चाहिए। प्रशासन अब मछली गिरोह की बाकी संपत्तियों और अन्य अवैध नेटवर्क पर नजर गड़ाए हुए है। बताते हैं कि एक लंबी लिस्ट तैयार है और आने वाले दिनों में कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। भोपाल में हुई यह कार्रवाई केवल एक कोठी का ध्वंस नहीं है। बल्कि यह उस माफिया संस्कृति के खिलाफ बिगुल है जिसने कानून को कमजोर करने की कोशिश की। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनकी सरकार का यह कदम जनता के भरोसे को मजबूत करता है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाता है कि क्या सरकार इस मुहिम को स्थायी बदलाव में बदल पाएगी या यह भी चुनावी नैरेटिव तक सीमित रह जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि डॉ.मोहन यादव की सरकार ने मछली माफिया के साम्राज्य को मलबे में बदलकर मध्यप्रदेश की राजनीति और समाज दोनों को एक सख्त संदेश दे दिया है कि अपराधियों के दिन अब सचमुच लद गए।