
पनवेल। महाराष्ट्र के बहुचर्चित अश्विनी बिदरे हत्याकांड में आखिरकार न्याय की बड़ी जीत हुई। सोमवार, 21 अप्रैल को पनवेल सत्र न्यायालय ने मुख्य आरोपी वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर अभय कुरुंदकर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह फैसला नौ साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आया है और इसे दिवंगत एपीआई अश्विनी बिदरे के परिवार के लिए न्याय की दिशा में बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।
क्या था मामला?
2016 में असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर अश्विनी बिदरे का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई थी। अदालत ने पाया कि अभय कुरुंदकर ने न सिर्फ अपहरण और हत्या की साजिश रची, बल्कि लकड़हारे का इस्तेमाल कर शव को भयंदर खाड़ी में फेंक दिया और सबूत मिटाने की पूरी कोशिश की।
अन्य दोषियों को भी सजा
मामले के दो अन्य आरोपी महेश पार्टिशनकर और कुंदन भंडारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 201 (सबूत नष्ट करना) के तहत दोषी ठहराया गया और सात साल कैद की सजा सुनाई गई। हालांकि, ट्रायल के दौरान उन्होंने जितना समय जेल में बिताया, उसे ध्यान में रखते हुए उन्हें उसी दिन रिहा कर दिया गया।
अदालत में भावुक माहौल
फैसले से पहले अदालत ने अश्विनी बिदरे के परिजनों को सुनवाई का मौका दिया। बिदरे की बेटी सिद्धि, पति राजू गोरे, पिता जयकुमार बिदरे और भाई आनंद बिदरे की भावनाएं अदालत में सामने आईं। सत्र न्यायाधीश पी. पालदेवर ने 11 अप्रैल को फैसला सुनाया और 21 अप्रैल को सजा का ऐलान किया।
अदालत परिसर में उमड़ी भीड़
सजा सुनाए जाने के दिन कुरुंदकर और अन्य दोषियों को कड़ी सुरक्षा के बीच अदालत लाया गया। बिदरे के गृह क्षेत्र हातकणंगले से लगभग 1,000 ग्रामीण, रिश्तेदार और समर्थक अदालत परिसर में मौजूद रहे। इस पूरे मामले ने न सिर्फ पुलिस विभाग में, बल्कि पूरे महाराष्ट्र में गहरी संवेदना और चर्चा पैदा की थी। इस मुकदमे में विशेष सरकारी वकील प्रदीप घरात ने अहम भूमिका निभाई, जबकि बचाव पक्ष के वकील विशाल भानुशाली ने आरोपी का पक्ष रखा। न्यायालय ने साक्ष्यों, गवाहों और परिस्थितियों के आधार पर दोष सिद्ध किया। यह फैसला न केवल बिदरे परिवार के संघर्ष और हिम्मत की जीत है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि न्याय में भले ही देर हो, पर अंधेर नहीं होता।




