नर्सरी से पीएचडी तक राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के पुनर्निर्माण की परिकल्पना

डॉ. दिवाकर दुबे
किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति सिर्फ उसकी सीमाओं, संसाधनों अथवा आर्थिक उपलब्धियों में नहीं होती, उसकी वास्तविक शक्ति उस ज्ञान में होती है, जिसे वह अपनी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाता है। शिक्षा वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से एक बच्चा केवल अक्षर पहचानना नहीं सीखता, बल्कि धीरे-धीरे अपने अधिकारों, कर्तव्यों, समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी भूमिका को भी समझने लगता है। इसलिए शिक्षा की व्यवस्था पर विचार करना वास्तव में राष्ट्र के भविष्य की संरचना पर विचार करना है।भारत में शिक्षा का विस्तार अनेक संस्थानों, बोर्डों, विश्वविद्यालयों और अलग-अलग शैक्षणिक व्यवस्थाओं के माध्यम से हुआ है। प्रत्येक व्यवस्था ने अपनी भूमिका निभाई है। फिर भी एक मूल प्रश्न आज भी विचारणीय है, जब विद्यार्थी का भविष्य एक ही राष्ट्र से जुड़ा है, तो उसकी शैक्षणिक पहचान को एक साझा राष्ट्रीय व्यवस्था के अंतर्गत क्यों नहीं विकसित किया जा सकता? एक बच्चा नर्सरी में प्रवेश लेते समय अपनी शिक्षा की यात्रा आरंभ करता है। वह वर्षों तक अध्ययन करता है, परीक्षाएं देता है,अंतत: संभव है कि शोध के माध्यम से ज्ञान की नई सीमाओं तक पहुंचे। इस पूरी यात्रा में उसकी कक्षाएं बदलती हैं, संस्थान बदलते हैं, पाठ्यक्रम बदलते हैं और प्रमाणपत्रों के स्वरूप भी बदल सकते हैं। लेकिन इन सभी चरणों के पीछे एक ही विद्यार्थी होता है, जिसकी शिक्षा एक निरंतर प्रक्रिया है।
यहीं से एक नई राष्ट्रीय शिक्षा-परिकल्पना जन्म लेती है। ऐसी व्यवस्था, जिसमें विद्यार्थी की शैक्षणिक यात्रा अलग-अलग अभिलेखों का बिखरा हुआ संग्रह मात्र न रहकर एक संगठित राष्ट्रीय पहचान का रूप धारण करे। इस विचार का उद्देश्य शिक्षा की विविधता को मिटाना नहीं, बल्कि उसके प्रशासनिक स्वरूप को इस प्रकार व्यवस्थित करना है कि देश के किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान में अर्जित योग्यता को पहचानने, प्रमाणित करने और समझने की प्रक्रिया अधिक सरल तथा विश्वसनीय बन सके। इस परिकल्पना में एक राष्ट्रीय शिक्षा प्राधिकरण की स्थापना का विचार होना चाहिए। जो देश की शिक्षा व्यवस्था को केवल नियंत्रित करने वाली संस्था न होकर, विभिन्न शैक्षणिक स्तरों के बीच राष्ट्रीय समन्वय स्थापित करने वाला निकाय हो। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना हो कि नर्सरी से लेकर पीएचडी तक प्रत्येक मान्यता प्राप्त शैक्षणिक उपलब्धि का रिकॉर्ड एक साझा राष्ट्रीय व्यवस्था में सुरक्षित और सत्यापित किया जा सके। इसके अंतर्गत प्रमाणपत्रों के लिए समान मूलभूत मानक निर्धारित किए जा सके, डिजिटल सत्यापन की एकीकृत सुविधा विकसित की जा सके और विद्यार्थियों के शैक्षणिक रिकॉर्ड को विभिन्न संस्थानों के बीच सुरक्षित रूप से स्थानांतरित करने की व्यवस्था बनाई जा सके। इस विचार की वास्तविक शक्ति केवल एक नई संस्था बनाने में नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति उस सिद्धांत में है, जिसके अनुसार राष्ट्रीय एकरूपता स्थापित करने के लिए प्रत्येक संस्थान की पहचान समाप्त करना आवश्यक नहीं है। एक विश्वविद्यालय की अपनी शैक्षणिक परंपरा हो सकती है, किसी राज्य के विद्यालयों की अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विशेषताएं हो सकती हैं तथा किसी संस्थान की शोध संबंधी विशिष्ट पहचान हो सकती है। राष्ट्रीय व्यवस्था इन विशेषताओं को सुरक्षित रखते हुए प्रमाणपत्रों की पहचान और सत्यापन के लिए एक साझा आधार प्रदान कर सकती है। इस प्रकार राष्ट्रीय प्राधिकरण का कार्य प्रत्येक संस्था को एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि अलग-अलग संस्थाओं के बीच ऐसी व्यवस्था स्थापित करना होना चाहिए जिसमें विद्यार्थी की योग्यता को समझने और प्रमाणित करने में अनावश्यक बाधाएं उत्पन्न न हों। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में प्रमाणपत्र किसी परीक्षा में प्राप्त अंकों या किसी पाठ्यक्रम को पूरा करने का दस्तावेज नहीं होता, वह विद्यार्थी की मेहनत, समय, योग्यता और शैक्षणिक उपलब्धि का आधिकारिक प्रमाण होता है। इसलिए प्रमाणपत्रों की विश्वसनीयता केवल उनके प्रारूप से नहीं, बल्कि उन्हें जारी करने वाली संस्था की वैधता और जिम्मेदारी से भी निर्धारित होती है। प्रस्तावित राष्ट्रीय व्यवस्था में प्रमाणपत्रों के लिए एक साझा प्रारूप, राष्ट्रीय सत्यापन पहचान और एकीकृत डिजिटल रिकॉर्ड की परिकल्पना की जा सकती है। इसके साथ संबंधित विद्यालय, बोर्ड, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का नाम, मान्यता और उपाधि प्रदान करने का अधिकार स्पष्ट रूप से दर्ज रहना चाहिए। इस व्यवस्था में राष्ट्रीय पहचान और संस्थागत पहचान एक-दूसरे के विरोधी नहीं होंगी। राष्ट्रीय प्रणाली प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता को पहचानने का माध्यम बनेगी, जबकि संबंधित संस्था अपनी निर्धारित शैक्षणिक जिम्मेदारी के अंतर्गत योग्यता प्रदान करेगी। इसका अर्थ यह होगा कि विद्यार्थी की शैक्षणिक उपलब्धि को देशव्यापी स्तर पर सत्यापित करना सरल हो, लेकिन यह भी स्पष्ट रहे कि उसने शिक्षा कहां से प्राप्त की और उसकी योग्यता किस सक्षम संस्था ने प्रदान की। यही इस परिकल्पना का मूल सिद्धांत है। प्रमाणपत्र की राष्ट्रीय पहचान हो, लेकिन उसकी शैक्षणिक जिम्मेदारी संबंधित मान्यता प्राप्त संस्था के पास स्पष्ट रूप से बनी रहे। भारत में अलग-अलग शिक्षा बोर्डों की उपस्थिति के पीछे ऐतिहासिक, प्रशासनिक, भाषाई और शैक्षणिक कारण हैं। इसलिए सभी बोर्डों को समाप्त करने का विचार केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं होगा,वह देश की शिक्षा व्यवस्था के व्यापक पुनर्गठन का प्रस्ताव होगा। फिर भी यह प्रश्न उठाना उचित है कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणपत्रों के सत्यापन, डिजिटल अभिलेखों और मूलभूत प्रशासनिक मानकों के लिए अनेक असंबद्ध व्यवस्थाओं पर निर्भर रहना आवश्यक है? एक संभावित विकल्प यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा प्राधिकरण के अंतर्गत सभी पात्र एवं मान्यता प्राप्त बोर्डों और संस्थानों को एक साझा प्रमाणपत्र प्रणाली से जोड़ा जाए। इस मॉडल में अलग-अलग बोर्ड अपने निर्धारित शैक्षणिक कार्य करते रह सकते हैं, लेकिन उनके द्वारा जारी प्रमाणपत्रों का राष्ट्रीय स्तर पर सत्यापन एकीकृत व्यवस्था के माध्यम से किया जा सकता है। दूसरा विकल्प एक ही राष्ट्रीय बोर्ड की स्थापना का है, जिसके अंतर्गत वर्तमान बोर्डों की कुछ या अधिकांश भूमिकाओं का पुनर्गठन किया जाए। लेकिन इस मॉडल के लिए राज्यों की भूमिका, पाठ्यक्रम संबंधी अधिकारों, भाषाई विविधता, संस्थागत स्वायत्तता और वर्तमान कानूनों पर व्यापक विचार करना आवश्यक होगा। राष्ट्रीय व्यवस्था को उन विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी बनाया जाना चाहिए, जिनके पास स्थायी इंटरनेट सुविधा या डिजिटल उपकरण उपलब्ध नहीं हैं। इसके लिए सहायता केंद्र, ऑफलाइन सत्यापन और प्रमाणपत्रों की भौतिक प्रतियाँ प्राप्त करने जैसे विकल्प बनाए रखना आवश्यक होगा। इस प्रकार एकीकृत प्रणाली की विश्वसनीयता केवल उसकी तकनीकी क्षमता पर निर्भर नहीं करेगी। वह इस बात पर भी निर्भर करेगी कि विद्यार्थी अपने रिकॉर्ड पर कितना भरोसा कर सकता है और त्रुटि या विवाद की स्थिति में उसे कितना प्रभावी संरक्षण प्राप्त होता है। (लेखक- लेडी इरविन कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य हैं।)

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