महाराष्ट्र में चारा संकट से निपटने के लिए सरकार का बड़ा एक्शन प्लान
जिला वार्षिक योजना के कम से कम 5% फंड से होगा चारा उत्पादन, चारा बैंक, हाइड्रोपोनिक्स और डिजिटल निगरानी व्यवस्था लागू होगी

मुंबई। अल-नीनो के प्रभाव से इस वर्ष बारिश में कमी और सूखे जैसी स्थिति को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने पशुधन के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने का व्यापक कार्ययोजना तैयार की है। इसके तहत जिला वार्षिक योजनाओं के कम से कम 5 प्रतिशत फंड का उपयोग चारा उत्पादन, उपलब्ध चारे के संरक्षण और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने के लिए किया जाएगा। पशुसंवर्धन मंत्री पंकजा मुंडे ने बताया कि चारा बैंक स्थापित करने, हाइड्रोपोनिक्स और अजोला पद्धति से चारा उत्पादन तथा जरूरत के अनुसार जिलों के बीच चारे की आपूर्ति जैसे उपाय किए जाएंगे। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडलीय उपसमिति ने 27 अक्टूबर की बैठक में अध्ययन समूह की सिफारिशों को मंजूरी दी। इसके बाद 30 अक्टूबर 2026 को शासनादेश जारी किया गया।
चारा उत्पादन बढ़ाने पर जोर
रबी सीजन में चारे के बीजों की कमी रोकने के लिए महाबीज और अन्य बीज उत्पादकों के माध्यम से बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। कम पानी में उगने वाली और एक से अधिक बार कटाई वाली फसलों को प्रोत्साहन मिलेगा। कृषि विश्वविद्यालयों, बीज केंद्रों, कृषि महामंडल और पशुसंवर्धन विभाग की जमीन पर मक्का, ज्वार, बाजरा सहित विभिन्न चारा फसलें उगाई जाएंगी। गोचर, बंजर और वन क्षेत्रों में उपलब्ध घास का भी संरक्षण कर पशुपालकों को उपलब्ध कराया जाएगा।
चारा बैंक और कीमतें तय
जिलावार चारा बैंक स्थापित करने के लिए किसान उत्पादक संगठनों, कंपनियों और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद ली जाएगी। चारा काटने और गठ्ठर बनाने वाली मशीनें भी उपलब्ध कराई जाएंगी। सरकार ने परिवहन खर्च छोड़कर सूखे चारे की अधिकतम कीमत 12 रुपये प्रति किलो और मुरघास की 8 रुपये प्रति किलो निर्धारित की है।
हाइड्रोपोनिक्स और अजोला को बढ़ावा
पशुपालकों के लिए चारा साक्षरता अभियान चलाया जाएगा। इसमें चारे की कटाई, भंडारण, मुरघास बनाने और धान के पुआल के बेहतर उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाएगा। पारंपरिक चारे पर निर्भरता कम करने के लिए हाइड्रोपोनिक्स, अजोला और कांटारहित नागफनी की खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा। पशु चिकित्सालयों में भी प्रायोगिक तौर पर इन विधियों से चारा उत्पादन की योजना है।
चारे के अन्य उपयोग पर रोक
चारा संकट के दौरान उपलब्ध चारे का इस्तेमाल केवल पशुओं के भोजन के लिए किया जाएगा। पैकेजिंग, जैव ईंधन और बिजली उत्पादन जैसे अन्य कार्यों में इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया है। सूखे की स्थिति में राज्य का चारा दूसरे राज्यों में भेजने पर भी कानूनी रोक लगाने की जिम्मेदारी जिलाधिकारियों को दी जाएगी। जरूरत पड़ने पर पड़ोसी जिलों से चारे की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
चारा शिविरों की डिजिटल निगरानी
चारा शिविरों के पारदर्शी संचालन के लिए राज्यस्तरीय ऑनलाइन मॉनिटरिंग प्रणाली विकसित की जाएगी। इसमें पशुओं का पंजीकरण, दैनिक उपस्थिति, चारे का वितरण, पानी, पशु चिकित्सा सेवाओं और खर्च का रिकॉर्ड रहेगा। बायोमेट्रिक या क्यूआर कोड से उपस्थिति, भारत पशुधन प्रणाली के जरिए पंजीकरण का सत्यापन और 24 घंटे सीसीटीवी निगरानी अनिवार्य करने की योजना है। चारा शिविरों के संचालन के लिए पालकमंत्री की अध्यक्षता में जिला स्तरीय निगरानी समिति तथा जिलाधिकारी की अध्यक्षता में कार्यकारी समिति गठित की जाएगी। स्थानीय परिस्थितियों, पशुधन की संख्या और चारे-पानी की उपलब्धता के आधार पर शिविर शुरू करने का निर्णय होगा।
सहकारी संस्थाओं और CSR की भी मदद
चारा प्रबंधन में चीनी मिलों, दुग्ध सहकारी संस्थाओं, गोशालाओं, स्वयंसेवी संगठनों और किसान उत्पादक कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। चीनी मिलों से गन्ने के पत्ते, बगास और शीरा उपलब्ध कराने की योजना है। चारा उत्पादन के लिए रियायती दर पर बिजली देने तथा चारा शिविरों में पानी, स्वच्छता और मशीनों की व्यवस्था के लिए CSR निधि का उपयोग करने की सिफारिश भी की गई है। पशुसंवर्धन विभाग जिलावार चारा उपलब्धता का आकलन कर साप्ताहिक रिपोर्ट तैयार करेगा। पशुओं के स्वास्थ्य और चारे की गुणवत्ता की भी जांच होगी। सरकार का उद्देश्य सूखे की स्थिति में किसानों और पशुपालकों के पशुधन को चारे की कमी से बचाना है।
