संपादकीय: दवा फैक्ट्रियों पर संकट!

अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष का असर अब केवल पेट्रोलियम पदार्थों तक सीमित नहीं रह गया है। इसकी आंच भारत के कृषि क्षेत्र, उद्योग और दवा कारोबार तक पहुंचने लगी है। हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के दवा उद्योग पर बढ़ता दबाव इस बात का संकेत है कि दुनिया के किसी एक हिस्से में होने वाला युद्ध हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के जीवन को भी प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है, क्योंकि देश दुनिया के प्रमुख दवा उत्पादकों में शामिल है और बड़ी संख्या में दवा कंपनियां कच्चे माल तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर निर्भर हैं।
हिमाचल प्रदेश का बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र और हरियाणा के दवा उत्पादन केंद्र देश के फार्मास्यूटिकल उद्योग में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इन क्षेत्रों में बड़ी कंपनियों के साथ-साथ हजारों लघु एवं मध्यम उद्यम भी सक्रिय हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण समुद्री परिवहन मार्गों पर दबाव, माल ढुलाई की बढ़ती लागत और ऊर्जा बाजार में अस्थिरता ने इन इकाइयों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सक्रिय औषधीय अवयवों (एपीआई), सॉल्वैंट्स और पेट्रोकेमिकल आधारित सामग्री की कीमतों में वृद्धि से उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। दवा उद्योग की एक बड़ी चुनौती पैकेजिंग सामग्री की बढ़ती कीमतें भी हैं। बोतलें, प्लास्टिक कंटेनर, शीशियां और अन्य पैकेजिंग उत्पाद पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल से तैयार होते हैं। जब कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है, तो इसका सीधा असर दवा कंपनियों के खर्च पर पड़ता है। पहले से ही कम लाभ के मार्जिन पर काम कर रही छोटी कंपनियों के लिए लागत में अचानक वृद्धि को सहन करना आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में उन्हें उत्पादन घटाने, नए ऑर्डर रोकने या नुकसान उठाकर कारोबार जारी रखने जैसे कठिन विकल्पों का सामना करना पड़ सकता है। इस संकट का एक मानवीय पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दवा उद्योग में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक काम करते हैं। ईंधन की बढ़ती कीमतें, रसोई गैस की उपलब्धता और रोजमर्रा के खर्चों में वृद्धि उनके जीवन को प्रभावित करती है। आर्थिक असुरक्षा बढ़ने पर श्रमिकों का पलायन या काम में अनिश्चितता पैदा हो सकती है। इसका असर उत्पादन क्षमता और औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ना स्वाभाविक है। किसी भी उद्योग की मजबूती केवल मशीनों, निवेश और कच्चे माल से तय नहीं होती, बल्कि उसमें काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा और स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भारत के लिए यह संकट एक पुरानी कमजोरी की ओर भी ध्यान खींचता है। दवा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद देश कई आवश्यक कच्चे माल और एपीआई के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर है। वैश्विक तनाव, व्यापारिक प्रतिबंध या समुद्री मार्गों में बाधा आने पर इस निर्भरता की कीमत घरेलू उद्योग को चुकानी पड़ती है। इसलिए केवल अस्थायी शुल्क छूट या राहत पैकेज से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। देश में एपीआई का उत्पादन बढ़ाने, वैकल्पिक आयात स्रोत विकसित करने और जरूरी कच्चे माल का पर्याप्त भंडार तैयार करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। सरकार को विशेष रूप से लघु एवं मध्यम दवा कंपनियों की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। उन्हें सस्ती कार्यशील पूंजी, कच्चे माल की उपलब्धता और परिवहन लागत में राहत देने के उपाय किए जाने चाहिए। साथ ही प्रवासी श्रमिकों के लिए आवास, भोजन, स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। दवा उत्पादन में किसी भी प्रकार की बाधा अंततः दवाओं की उपलब्धता और कीमतों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए उद्योग को राहत देना केवल कारोबारी हितों का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। दूर पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष भारत को यह चेतावनी दे रहा है कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर अत्यधिक निर्भरता किसी भी समय गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर सकती है। भारत को दवा उत्पादन में अपनी क्षमता का इस्तेमाल करते हुए आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना होगा। युद्ध कब समाप्त होगा, यह भारत के नियंत्रण में नहीं है, लेकिन उसके प्रभाव से देश के उद्योग, श्रमिकों और मरीजों को बचाने की तैयारी करना सरकार और उद्योग दोनों की जिम्मेदारी है। दवा उद्योग की मजबूती ही देश की स्वास्थ्य सुरक्षा की मजबूती है।

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