दीवान बहादुर एम एम मुलना: लोकसेवा और दानशीलता की अमिट विरासत

हेमेन्द्र क्षीरसागर
किसी पीड़ित व्यक्ति को देखकर दुःखी होना संवेदनशीलता का परिचायक है, किंतु उसके दुःख को दूर करने के लिए आगे बढ़ना ही सच्ची मानवता है। परोपकार की सार्थकता केवल सद्भावना व्यक्त करने में नहीं, बल्कि अपने सामर्थ्य और संसाधनों को दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए समर्पित करने में निहित है। दीवान बहादुर मानेकजी मेरवानजी मुलना का जीवन इसी मानवीय दर्शन का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने अपनी संपत्ति को निजी वैभव का साधन बनाने के बजाय जनकल्याण के लिए समर्पित किया। अपनी कर्मभूमि बालाघाट को ऐसी विरासत दी, जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
बालाघाट से आत्मीय जुड़ाव
दीवान बहादुर एम एम मुलना का जन्म 25 अक्टूबर 1868 को बंबई के एक पारसी परिवार में हुआ था। उन्होंने नागपुर के मॉरिस कॉलेज से वर्ष 1891 में एमए और 1892 में विधि की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्हें अतिरिक्त सहायक आयुक्त नियुक्त किया गया। प्रशासनिक सेवा के दौरान बालाघाट से उनका जुड़ाव हुआ, जो आगे चलकर आजीवन समर्पण में परिवर्तित हो गया। उन्होंने बालाघाट को अपनी कर्मभूमि बनाया और यहीं जीवन बिताने का निर्णय लिया। आजीवन अविवाहित रहे मुलना साहब ने अपना समय, सामर्थ्य और संपत्ति समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दी। बालाघाट जिले में डिस्ट्रिक्ट काउंसिल की स्थापना के बाद वे लगभग 35 वर्षों तक उसके अध्यक्ष निर्वाचित होते रहे। उनकी सार्वजनिक सेवाओं के लिए उन्हें खान बहादुर की मानद उपाधि प्रदान की गई। जिसे बाद में दीवान बहादुर के रूप में परिवर्तित किया गया।
जनहित के लिए समर्पित
मुलना साहब की दानशीलता का महत्त्व केवल उनकी उदारता तक सीमित नहीं था। उन्होंने नगर की आवश्यकताओं और भावी पीढ़ियों के हितों को ध्यान में रखकर सार्वजनिक सुविधाओं तथा संस्थागत विकास को प्रोत्साहित किया। नगर की जलप्रदाय योजना, बस स्टैंड के समीप सार्वजनिक धर्मशाला, उद्यान के लिए भूमि, मुलना स्टेडियम तथा शासकीय पॉलिटेक्निक महाविद्यालय के लिए भूमि दान जैसे जन हितैषी कार्यों में योगदान है। अपने आवासीय बंगले को भी जनहित के लिए समर्पित कर दिया, जहां आज पॉलिटेक्निक कालेज संचालित हो रही है।
वसीयत, ट्रस्ट और जनहित
मुलना साहब की उदारता अचल संपत्ति तक सीमित नहीं थी। उनके जीवन-वृत्तांत में अपनी संपत्ति के साथ तत्कालीन समय के करोड़ों रुपये मूल्य के शेयर जनहित में समर्पित करने का उल्लेख मिलता है। इन परिसंपत्तियों का वर्तमान मूल्य और स्थिति संबंधित अभिलेखों के सत्यापन से ही स्पष्ट हो सकती है। उन्होंने अपनी संपत्ति और शेयरों के प्रबंधन तथा उपयोग के लिए वसीयत के माध्यम से एक ट्रस्ट को जिम्मेदारी सौंपी थी। ताकि बालाघाट नगरवासियों के हित में निर्धारित कार्य किए जा सकें। इस ट्रस्ट के माध्यम से पेयजल आपूर्ति, मुलना स्टेडियम और सार्वजनिक धर्मशाला सहित कुछ कार्यों के संपन्न होने का उल्लेख मिलता है।
महान दानवीर को सच्ची श्रद्धांजलि
मुलना साहब ने 2 जुलाई 1957 को अपने जीवन की अंतिम साँस ली। उनका भौतिक जीवन समाप्त हो गया, लेकिन बालाघाट के प्रति उनका समर्पण और दानशीलता की प्रेरणा आज भी प्रासंगिक है। बालाघाट के नागरिकों के लिए उनकी विरासत गर्व का विषय होने के साथ-साथ एक नैतिक दायित्व भी है। उनके जीवन और योगदान का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण किया जाए। उनसे जुड़ी सार्वजनिक धरोहरों का संरक्षण हो। उनकी वसीयत में निहित जनकल्याणकारी उद्देश्यों की स्थिति स्पष्ट की जाए। दीवान बहादुर एम एम मुलना की विरासत तभी जीवंत रहेगी। जब उनकी दानशीलता से मिली धरोहर सुरक्षित रहेगी। जनहित में उसका सदुपयोग होगा। उनके अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए ईमानदार प्रयास किए जाएंगे। यही उस महान दानवीर के प्रति बालाघाट की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
