
पवन वर्मा
मध्यप्रदेश के राज्यसभा चुनाव में इस बार सबसे ज्यादा चर्चा तीसरी सीट को लेकर है। दो सीटों पर तस्वीर साफ है, लेकिन तीसरी सीट ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। तीसरी सीट के लिए भाजपा ने महेश केवट को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है, जबकि कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को मैदान में उतारा है। संख्या बल के हिसाब से कांग्रेस की स्थिति मजबूत दिखाई देती है, लेकिन भाजपा के इस दांव ने चुनाव को महज गणित का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन और संगठनात्मक क्षमता की परीक्षा बना दिया है। मध्य प्रदेश विधानसभा की कुल 230 सीटों में से दतिया सीट रिक्त है, जबकि विजयपुर विधानसभा क्षेत्र से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव में 228 विधायक मतदान के पात्र हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 58 मतों की आवश्यकता होती है। विधानसभा में भाजपा के 164 और कांग्रेस के 64 विधायक हैं, जबकि एक विधायक अन्य में है। इसी संख्या बल के आधार पर तीसरी सीट का मुकाबला रोचक स्थिति में पहुंच गया है।
तीन सीटों में से दो पर भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुघ और प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल का राज्यसभा पहुंचना तय है। कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन भी अपने दल के संख्या बल के आधार पर मजबूत स्थिति में हैं। यहां तक तो सबकुछ ठीक दिख रहा था लेकिन भाजपा ने तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को उतारकर इस चुनाव को और अधिक रोचक एवं चुनौतीपूर्ण कर दिया। भाजपा को यह पता है कि तीसरी सीट के लिए उसके पास अपने दम पर आवश्यक संख्या नहीं है। इसके बावजूद उम्मीदवार उतारने का फैसला बताता है कि पार्टी कांग्रेस की एकजुटता को परखना चाहती है और साथ ही यह संदेश देना चाहती है कि वह विपक्ष को बिना चुनौती दिए कोई सीट नहीं छोड़ने वाली। तीसरी सीट के लिए भाजपा के पास 48 वोट उपलब्ध हैं, जबकि जीत के लिए 58 वोट चाहिए। यानी पार्टी को कम से कम 10 अतिरिक्त मतों की जरूरत है। दूसरी ओर कांग्रेस के पास 64 विधायक हैं और उसे अपनी उम्मीदवार को जिताने के लिए 58 वोट चाहिए, इसी बीच चर्चा है कि कांग्रेस की एक विधायक निर्मला सप्रे भाजपा के साथ जा सकती है।
मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष की परीक्षा
भाजपा की ओर से यह चुनाव मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल की राजनीतिक क्षमता का आकलन भी करेगा। मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव के नेतृत्व में यह पहला ऐसा राज्यसभा चुनाव है, जिसमें पार्टी ने अतिरिक्त उम्मीदवार उतारकर विपक्ष को सीधी चुनौती दी है। यदि भाजपा तीसरी सीट पर अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन करती है या अतिरिक्त समर्थन जुटाने में सफल रहती है, तो इसका राजनीतिक लाभ मुख्यमंत्री को मिलेगा। यह संदेश जाएगा कि सत्ता और संगठन दोनों पर उनकी पकड़ मजबूत है, और वे भी कांग्रेस में सेंध लगा सकते हैं। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल के लिए भी यह चुनाव कम महत्वपूर्ण नहीं है। खण्डेलवाल के सामने पहली बार ऐसा अवसर आया है, जब संगठनात्मक सक्रियता और राजनीतिक प्रबंधन को परखा जाएगा। पार्टी यदि मुकाबले को अंत तक रोचक बनाए रखती है, तो इसका श्रेय संगठन को भी मिलेगा।
कांग्रेस के लिए असली चुनौती
तीसरी सीट पर संख्या बल के लिहाज से कांग्रेस की स्थिति बेहतर है, लेकिन उसकी चुनौती भाजपा से अलग है। कांग्रेस की असली चुनौती अतिरिक्त वोट जुटाने की नहीं, बल्कि अपने सभी विधायकों को एकजुट बनाए रखने की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि मतदान के दिन कोई अप्रत्याशित स्थिति पैदा न हो। यदि कांग्रेस के सभी विधायक पार्टी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करते हैं तो मीनाक्षी नटराजन की जीत सुनिश्चित है,लेकिन यदि वोटों में कमी दिखाई देती है या क्रॉस वोटिंग होती है, तो सबसे पहले सवाल इन दोनों नेताओं पर उठेंगे। ऐसे में यह चुनाव जीतू पटवारी और उमंग सिंघार की संगठनात्मक क्षमता का भी परीक्षण माना जा रहा है।
कमलनाथ और दिग्विजय की भी अग्निपरीक्षा
राज्यसभा चुनाव की इस लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पहलू कांग्रेस की आंतरिक राजनीति भी है। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अभी भी अलग अलग गुट है। पार्टी के अनेक विधायक किसी न किसी रूप में इनसे जुड़े माने जाते हैं। यही कारण है कि यह चुनाव केवल वर्तमान प्रदेश नेतृत्व की परीक्षा नहीं है। मीनाक्षी नटराजन को कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में यह अपेक्षा भी है कि प्रदेश के सभी नेता पूरी ताकत से उनके समर्थन में खड़े दिखाई दें। यदि कांग्रेस उम्मीदवार को अपेक्षित मत नहीं मिलते हैं, तो सवाल केवल जीतू पटवारी और उमंग सिंघार पर नहीं उठेंगे। यह चर्चा भी होगी कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह अपने प्रभाव एवं गुट वाले विधायकों को एकजुट क्यों नहीं रख पाए।
दिल्ली की नजर भी भोपाल पर
इस चुनाव पर केवल मध्यप्रदेश ही नहीं, दिल्ली की भी नजर है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व राज्यसभा चुनाव के नतीजों को प्रदेश की राजनीतिक स्थिति के संकेत के रूप में देखेंगे। कांग्रेस में विशेष रूप से यह चुनाव भविष्य की राजनीति से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव और नगरीय निकाय चुनावों की तैयारी के बीच केंद्रीय नेतृत्व यह देखेगा कि प्रदेश के कौन से नेता अपने प्रभाव वाले विधायकों को संगठित रखने में सफल रहे। इसका असर भविष्य में संगठनात्मक जिम्मेदारियों और टिकट वितरण पर भी दिखाई दे सकता है। भाजपा भी इस चुनाव के जरिए विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा लेना चाहती है। यदि पार्टी अपने निर्धारित वोटों से अधिक समर्थन हासिल करती है तो वह इसे राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करेगी।
केवल सीट नहीं, संदेश भी
राज्यसभा की तीसरी सीट का परिणाम चाहे जो हो, यह चुनाव कई राजनीतिक संदेश छोड़ने वाला है। एक तरफ भाजपा यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि वह संख्या कम होने के बावजूद राजनीतिक मुकाबला खड़ा कर सकती है। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने यह अवसर है कि वह अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करे। यही कारण है कि यह मुकाबला केवल महेश केवट और मीनाक्षी नटराजन के बीच नहीं है। यह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की राजनीतिक साख से भी जुड़ गया है।
मतदान के बाद केवल यह तय नहीं होगा कि तीसरी सीट किसके खाते में गई, बल्कि यह भी सामने आएगा कि मध्य प्रदेश की राजनीति में किस नेता की कितनी पकड़ है। यही वजह है कि राज्यसभा की तीसरी सीट का यह मुकाबला प्रदेश की राजनीति का सबसे दिलचस्प चुनाव बन गया है।



