
विवेक रंजन श्रीवास्तव
जब समाज का सॉफ्टवेयर अपडेट होता है, तो वर्ग-संघर्ष भी पुराने वर्जन को छोड़कर सीधे क्लाउड पर चले जाते हैं। एक जमाना था जब लोग कुल, गोत्र और जातियों के दलदल में लाठियां भांजते थे, लेकिन आज का नया भारत मॉडर्न हो चुका है। संघर्ष के बिलकुल नए, चमचमाते और डिजिटल पैरामीटर सेट कर लिए हैं। अब पुरानी वर्ण व्यवस्था किसी कबाड़खाने में पड़ी जंग लगी मशीन जैसी लग रही है। क्योंकि अब देश की अस्मिता इस बात से तय नहीं होती कि आप किस कुल में पैदा हुए हैं, बल्कि इस बात से तय होती है कि नेशनल टेलीविजन पर आपको “दो कौड़ी” का कहा गया है या फिर वातानुकूलित कोर्ट की खिड़की से आपको कॉकरोच की तरह रेंगते हुए देखा जा रहा है। सरकारी नौकरियों का सूरज धीरे-धीरे अस्त हो चुका है, इसलिए आरक्षण की वो पुरानी, तीखी और कड़वी बहसें भी कड़ाही पनीर की खुशबू में विलीन हो चुकी हैं, जहां आरक्षित और अनारक्षित दोनों ही वर्ग अब एक ही प्राइवेट कंपनी के काउंटर पर अपनी सीवी लेकर डिलिवरी बाय या एजेंट बनने के लिए कतार में खड़े हैं। इस नए दौर के समाजशास्त्रियों को अगर देश का नया वर्गीकरण करना हो, तो उन्हें पुराने सेंसस के पन्नों को फाड़कर फेंकना होगा। जनगणना अधिकारी, किसी के घर का दरवाजा खटखटाता है और पुराना सवाल पूछने के बजाय सीधे मुद्दे पर आता है कि हुजूर, यह बताइए कि आप इस देश के सजग, संघर्षशील नागरिक हैं या फिर किसी आलीशान चैनल की नजर में दो कौड़ी के यूट्यूबर और उनके दर्शक हैं। आपके घर में कितने काकरोच हैं? और कितने दो कौड़ी के लोग हैं? आज इज्जत इस बात की नहीं है कि आपके पास कितनी जमीन है, कौन सी कार है, वह तो सबको पता है कि ईएमआई पर ली जाती हैं। महत्व इस बात का है कि आपका स्क्रीन टाइम कितना है। यदि आप हाथ में चॉक और डस्टर लेकर या डिजिटल बोर्ड पर लाखों गरीब बच्चों को परीक्षा पास करने का हुनर सिखा रहे हैं, तो बड़े एलीट क्लास की नजर में आपकी कीमत दो कौड़ी की है और अगर आप टीआरपी की अंधी दौड़ में चीखते हुए पूरे देश को कॉकरोच समझ रहे हैं, तो आप खुद को एलीट क्लास का स्वयंभू शहंशाह मान सकते हैं। यह वर्ग संघर्ष इतना दिलचस्प है कि इसमें बंदूकें नहीं चलतीं, बल्कि हैशटैग और व्यूज के ट्वीटर तीर चलते हैं। जहां एक तरफ करोड़ों की भीड़ अपने गुरुओं के सम्मान में मोर्चा खोले बैठी है और दूसरी तरफ पारंपरिक मीडिया अपनी ढहती साख को बचाने के लिए चैट जीपीटी पर नए नए विशेषण ढूंढ रहा है। जनगणना के न्यू फॉर्म में जब आप थोड़ा आगे बढ़ें, तो आपको एक और खामोश लेकिन बेहद जानलेवा युद्ध दिखाई देगा, जिसे जेन जी बनाम बूमर्स का नाम दिया जा सकता है। यह एक ऐसा विभाजन है जिसके सामने पुरानी तमाम दीवारें छोटी पड़ जाती हैं। एक तरफ वो पीढ़ी है जो सुबह उठकर सबसे पहले चाय की चुस्की के साथ अखबार टटोलती है और कहती है कि हमारे जमाने में हमने कितनी तकलीफें झेली हैं, और दूसरी तरफ वो नई उम्र के युवा हैं जो जीवन के किसी भी छोटे से तनाव पर सीधे थेरेपी लेने चले जाते हैं, जिनका आधा जीवन सिचुएशनशिप के असमंजस में कट रहा है और जो इंस्टाग्राम रील्स के चौदह सेकंड में ब्रह्मांड का सारा ज्ञान समेट लेना चाहते हैं। इन दोनों के बीच कोई संवाद संभव ही नहीं है, क्योंकि एक वर्ग की भाषा मुहावरों से चलती है और दूसरे की मीम्स से। सेंसस कमिश्नर को इस कॉलम में बकायदा दर्ज करना होगा कि देश में कितने लोग अपनी पुरानी यादों के मलबे में वर्तमान को कोसते हुए जी रहे हैं और कितने लोग अटेंशन डेफिसिट के शिकार होकर हर पांच सेकंड में अपने फोन का नोटिफिकेशन चेक कर रहे हैं। शादियों के रजिस्ट्रेशन में भी अब जातियों का पुराना रूतबा खत्म हो चला है, क्योंकि अब वहां असली जंग अरेंज्ड मैरिज के पारंपरिक सस्टेनेबिलिटी मॉडल्स और लव मैरिज के आधुनिक कयामत वाले सिद्धांतों के बीच छिड़ गई है। यह समाज का वह नया वर्गीकरण है जहां एक तरफ वो लोग हैं जो कुंडली के छत्तीस गुण मिलाकर, खानदान की रजामंदी से मय दहेज ब्याहे गए हैं और पूरी जिंदगी इस भ्रम को पालने में गुजार देते हैं कि बिना किसी खास लगाव के भी बर्तनों को बिना खड़काए जिंदगी काटी जा सकती है। दूसरी तरफ वो क्रांतिकारी प्रेमी जोड़े हैं जिन्होंने पूरी दुनिया से लड़कर, सात जन्मों के वादे करके आन लाइन लव मैरिज की है। जाति, धर्म और भूगोल की सीमा से पार जाकर आशियाना बसाया है। लेकिन अब उनका सबसे बड़ा संघर्ष दुनिया के सामने यह छुपाना है कि इतनी बेपनाह मोहब्बत के बाद भी उनके घर के भीतर रोज महाभारत क्यों हो रही है। समाज अब इन दो नए खेमों में बंट चुका है, जहां एक पक्ष दूसरे को देखकर मुस्कुराता है और दूसरा पक्ष पहले की बोरियत पर तरस खाता है। जब इस नए सेंसस का फाइनल डेटा देश के सामने आएगा, तो नजारा वाकई अद्भुत होगा। रिपोर्ट में लिखा होगा कि देश की साठ प्रतिशत से ज्यादा आबादी सुबह-सुबह अपने फोन की टूटी हुई स्क्रीन पर दो कौड़ी के शिक्षकों से गणित और कोडिंग सीखकर अपना भविष्य बनाने में जुटी है, जबकि बीस प्रतिशत आबादी खुद को सुबह पार्क में मंहगा कुत्ता घुमाते और उसकी पाटी काली पालीथीन में समेटते हुए, एलीट मानकर बाकी के अस्सी प्रतिशत को काकरोच, कीड़े-मकौड़े साबित करने के नए-नए नैरेटिव गढ़ रही है। उसी रिपोर्ट के एक कोने में लिखा होगा कि देश के पंद्रह प्रतिशत युवा रील स्क्रॉल करते-करते सेंसस का फॉर्म बीच में ही अधूरा छोड़कर भाग गए क्योंकि उनका ध्यान भटक गया था, और बाकी बचे पांच प्रतिशत लोग इस गंभीर विमर्श में व्यस्त हैं कि पारंपरिक समझौते वाली जिंदगी बेहतर है या रोमांटिक धोखे वाली। वक्त वाकई बदल चुका है, अब लोग अपना गोत्र नहीं,अपना ओपिनियन छुपाते हैं। पुराना संघर्ष रोटी, कपड़ा और मकान का था, जबकि यह नया संघर्ष पूरी तरह से व्यूज, यूट्यूब और मेटा अर्निग,वैलिडेशन और वाई-फाई की स्पीड पर आकर टिक चुका है,जिसे हमारे देश का नया और अपग्रेडेड वर्ग संघर्ष कहा जा सकता है। जो राजनेता इस डेटा को समझ लेंगे वे अगले चुनावी मौसम में ट्रेंड करेंगे।



