अंतरराष्ट्रीय फजीहत: संयुक्त राष्ट्र ने भारत सरकार को लगाई फटकार, हजारों की हिरासत पर जताई गंभीर चिंता

इंद्र यादव/मुंबई। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करने वाले देश में अब विरोध करना भी अपराध बन गया लगता है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाले हजारों लोगों को हिरासत में लेने की सरकारी कार्रवाई अब सिर्फ देश के अंदर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गई है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने साफ शब्दों में भारत सरकार को चेतावनी दी है।शनिवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के प्रवक्ता थामीन अल-खीतान ने बयान जारी कर कहा कि दिल्ली में बड़े पैमाने पर प्रदर्शनकारियों, प्रदर्शन नेताओं, नागरिक समाज के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरें बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने साफ कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का अधिकार लोकतंत्र का मूल हिस्सा है। प्रतिबंध तभी लगाए जा सकते हैं जब वे जरूरी और सही अनुपात में हों।प्रवक्ता ने भारतीय अधिकारियों से अपील की कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का इस्तेमाल करते समय पूरी संयम बरती जाए। साथ ही जो लोग मनमाने तरीके से हिरासत में लिए गए हैं, उन्हें तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को लोगों की व्यापक चिंताओं पर सार्थक बातचीत करनी चाहिए।यह बयान तब आया जब दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ बड़े प्रदर्शन की तैयारी चल रही थी। प्रदर्शनकारियों का मुख्य मुद्दा था मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और मतदाता सूची में हो रहे कथित बड़े बदलावों की जांच। विरोध करने वाले युवा, विपक्षी नेता, वकील और आम नागरिक सड़कों पर उतरे। लेकिन पुलिस ने जगह-जगह बैरिकेड लगा दिए, लोगों को बस में भरकर हिरासत में ले लिया और कई जगहों पर प्रदर्शन ही नहीं होने दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली में हजारों लोग हिरासत में लिए गए। कुछ रिपोर्ट्स में यह संख्या 7 हजार के आसपास बताई गई। वकीलों और पत्रकारों को भी नहीं छोड़ा गया। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों को पानी तक नहीं दिया गया और उन्हें दूर-दूर छोड़ दिया गया।सरकार की इस कार्रवाई ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब कोई चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, तो क्या जवाब सिर्फ हिरासत है? लोकतंत्र में असहमति को दबाने का तरीका यही रह गया है क्या? संयुक्त राष्ट्र ने साफ कहा है कि यह तरीका भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों के खिलाफ है। अब देखना यह है कि सरकार संयुक्त राष्ट्र की इस चेतावनी को गंभीरता से लेती है या फिर इसे भी नजरअंदाज कर देती है। दुनिया देख रही है कि भारत में विरोध की आवाज को कैसे सुना जा रहा है। अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर भी थोक के भाव हिरासत का जवाब दिया जाएगा, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की साख और ज्यादा प्रभावित होगी।
