कृत्रिम मेधा: भारत के सामने अवसर और चुनौती

डॉ. शैलेश शुक्ला
कृत्रिम मेधा यानी एआई आज दुनिया की सबसे तेज तकनीकी दौड़ बन गई है। चैटबॉट से लेकर अस्पतालों तक और खेतों से लेकर बैंकों तक हर जगह इसकी चर्चा है। भारत इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता। उसके पास हुनर भी है – बड़ा सॉफ्टवेयर उद्योग, यूपीआई जैसी सरल डिजिटल सेवाएं और युवा आबादी। सरकार ने मार्च 2024 में 10,371 करोड़ रुपये का ‘इंडियाएआई मिशन’ शुरू किया है। लक्ष्य है – भारत में एआई बनाना और भारत के लिए एआई बनाना पर सपने और हकीकत के बीच कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती कंप्यूटर की किल्लत है। बड़े एआई मॉडल बनाने के लिए जीपीयू जैसी शक्तिशाली चिप्स चाहिए। अमेरिका और चीन की कंपनियां लाखों जीपीयू एक साथ चलाती हैं। भारत ने मिशन के तहत पहले 10,000 और फिर 18,000 से ज्यादा जीपीयू जुटाने की योजना बनाई है। यह सराहनीय है, पर ये चिप्स भारत में नहीं बनतीं। इन्हें बाहर से खरीदना पड़ता है और उत्पादन कुछ ही कंपनियों के हाथ में है। मांग बढ़ने पर कीमत और आपूर्ति दोनों अनिश्चित हो जाती हैं। एडवांस चिप्स पर विदेशी पाबंदियां भी भविष्य में बाधा बन सकती हैं। भारत के डेटा सेंटरों की क्षमता भी सीमित है। जिस ईंधन से एआई का इंजन चलता है, वही महंगा और दुर्लभ है।
दूसरी छिपी हुई चुनौती बिजली और पानी की है। एआई सिर्फ चिप्स नहीं, बिजली और पानी भी खाता है। डेटा सेंटर ठंडे रहने के लिए भारी बिजली-पानी लेते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में कहा गया है कि बिजली, पूंजी और पानी विस्तार की बड़ी बाधा हैं। घरों, खेतों और कारखानों को भी बिजली चाहिए, वहीं डेटा सेंटरों की भूख बढ़ रही है। भारत की ज्यादातर बिजली अभी जीवाश्म ईंधन से बनती है, इसलिए बिना योजना के विस्तार से पर्यावरण पर बोझ पड़ेगा। तीसरी चुनौती डेटा की है। भारत 22 अनुसूचित भाषाओं और सैकड़ों बोलियों का देश है। एआई उसी भाषा में अच्छा काम करता है, जिस भाषा में उसे डेटा मिले। इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं की सामग्री एक प्रतिशत से भी कम है। छोटी भाषाओं में साफ-सुथरा डेटा दुर्लभ है। इसलिए स्टार्टअप मजबूरी में सिंथेटिक डेटा पर मॉडल बनाते हैं। भारतीयों का बहुत सारा डेटा विदेशी प्लेटफॉर्मों के पास बंद है। सरकार ‘भाषिनी’ से भारतीय भाषाओं का डेटा जुटा रही है, पर जरूरत कहीं ज्यादा है। अगर एआई को किसान की भाषा में बात करनी है, तो पहले उस भाषा का डेटा बनाना होगा। चौथी चुनौती प्रतिभा की है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा इंजीनियर तैयार करता है और एआई-साक्षर कार्यबल में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर है। दुनिया की एआई प्रतिभा में भारतीयों की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत है। फिर भी कोर एआई कौशल में मांग और आपूर्ति का अंतर 51 प्रतिशत तक है। बड़े मॉडल बनाने का अनुभव विदेशी कंपनियों में काम कर चुके लोगों के पास है, यह ज्ञान किताबों में नहीं मिलता। तेज दिमागों का विदेश जाना जारी है। भारत को अनुभवी लोगों को वापस लाना और यहीं नए विशेषज्ञ तैयार करने होंगे।इसके साथ ही रिसर्च और पूंजी की कमी भी बड़ी बाधा है। बुनियादी एआई रिसर्च में हमारा निजी क्षेत्र अमेरिका-चीन से बहुत कम निवेश करता है। जनवरी 2025 में चीन की ‘डीपसीक’ ने कम खर्च में बेहतरीन मॉडल बना दिखाए, तो चिंता बढ़ी। आईआईटी और आईआईएससी में अच्छा काम होता है, पर वह बाजार तक नहीं पहुंच पाता। निवेशक जल्दी मुनाफा चाहते हैं, जबकि बुनियादी मॉडल में सालों और बड़ी रकम लगती है। नतीजा यह है कि नासकॉम के अनुसार भारत की 75 प्रतिशत कंपनियां एआई के सिर्फ परीक्षण चरण पर अटकी हैं। आखिर में दो बड़े सवाल रोजगार और नियमों के हैं। आर्थिक सर्वेक्षण ने चेतावनी दी है कि एआई बढ़ने पर विदेशी कंपनियां वह काम खुद करने लगेंगी जो वे भारत को देती थीं। कॉल सेंटर, टेस्टिंग और बुनियादी कोडिंग एआई संभाल रहा है। करोड़ों युवा हर साल रोजगार ढूंढते हैं और बाजार बदल रहा है। इसका जवाब लोगों को नए हुनर तेजी से सिखाना है। साथ ही डीपफेक, निजता और चुनावों में दुरुपयोग के सवाल हैं। भारत ने 2023 में डेटा संरक्षण कानून बनाया, पर एआई के लिए व्यापक नियम अधूरे हैं। सख्त कानून से नवाचार रुकेगा और ढीला छोड़ने से दुरुपयोग बढ़ेगा। एआई का फायदा तभी है जब वह आखिरी गांव तक पहुंचे। आज भी फोन की कीमत, इंटरनेट की रफ्तार और डिजिटल साक्षरता चुनौती हैं। किसान तक एआई तभी पहुंचेगा जब वह उसकी भाषा में बात करे। भारत ने यूपीआई से दिखाया है कि सस्ते और सरल समाधान से दुनिया में मिसाल बन सकती है। एआई में भी महंगे विदेशी मॉडलों की नकल के बजाय भारतीय जरूरतों के छोटे, सस्ते और भाषाई मॉडल बनाना रास्ता हो सकता है। यह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि धैर्य, दूरदर्शिता और साझा जिम्मेदारी का इम्तिहान है।
