महिलाओं को मिले कानूनी अधिकार और वास्तविक न्याय के बीच की खाई पाटना जरूरी: विजया रहाटकर

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा— संपत्ति और कृषि भूमि पर महिलाओं का वास्तविक अधिकार सुनिश्चित हो; राज्य-विशिष्ट कानूनों की समीक्षा से तैयार हों व्यावहारिक सिफारिशें

मुंबई। महिलाओं को कानून के तहत मिले अधिकार और वास्तविक जीवन में उन्हें मिलने वाले न्याय के बीच की खाई को दूर करने के लिए राज्य-विशिष्ट कानूनों की गहन समीक्षा कर व्यावहारिक और क्रियान्वयन योग्य सिफारिशें तैयार करना जरूरी है। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने मुंबई में आयोजित विचार-मंथन कार्यक्रम में यह बात कही। सोमवार को राष्ट्रीय महिला आयोग, महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), मुंबई के स्कूल ऑफ लॉ, राइट्स एंड कॉन्स्टिट्यूशनल गवर्नेंस के संयुक्त तत्वावधान में TISS के एस. परशुराम सभागार में ‘राज्य-विशिष्ट कानूनों की समीक्षा पर विचार-मंथन’ आयोजित किया गया। कार्यक्रम में महिलाओं के उत्तराधिकार एवं संपत्ति अधिकार, कृषि भूमि पर मालिकाना हक, किसान आत्महत्याओं के बाद परिवार की महिलाओं की स्थिति, कार्यस्थल पर सुरक्षा, न्याय तक पहुंच तथा वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार और संरक्षण से जुड़े विभिन्न कानूनों पर चर्चा हुई।
खेती में काम करना ही महिला सशक्तिकरण नहीं
महाराष्ट्र की महिला किसान नीति का उल्लेख करते हुए रहाटकर ने कहा कि महिलाओं का वास्तविक और सार्थक सशक्तिकरण केवल इस बात तक सीमित नहीं होना चाहिए कि वे खेती में काम करती हैं। यह भी देखना जरूरी है कि जमीन महिला के नाम पर है या नहीं, उसका उत्तराधिकार अधिकार दर्ज हुआ है या नहीं और कृषि संसाधनों से जुड़े फैसले लेने का अधिकार उसके पास है या नहीं। उन्होंने कहा कि संपत्ति पर महिलाओं का अधिकार केवल उत्तराधिकार का विषय नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और निर्णय लेने की क्षमता से भी जुड़ा है। कानूनी अधिकार होने के बावजूद सामाजिक दबाव, पारिवारिक कठिनाइयों, कानून की पर्याप्त जानकारी न होने और उत्तराधिकार दर्ज कराने में आने वाली बाधाओं के कारण कई महिलाओं को वास्तविक मालिकाना हक नहीं मिल पाता।
वरिष्ठ महिलाओं की समस्याओं पर विशेष ध्यान जरूरी
‘मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट, 2007’ की समीक्षा का उल्लेख करते हुए रहाटकर ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं को केवल आर्थिक सहायता या देखभाल तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसमें स्वास्थ्य, आवास, सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग, सामाजिक सहभागिता और सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ महिलाओं को विधवा होने, आर्थिक निर्भरता, अकेलेपन और पारिवारिक सहयोग के अभाव के कारण अलग तरह की असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए कानून और नीतियां बनाते समय वरिष्ठ महिलाओं की विशेष जरूरतों पर ध्यान देना आवश्यक है।
कानून की खामियों और क्रियान्वयन की बाधाओं की होगी समीक्षा
रहाटकर ने बताया कि कानूनों की समीक्षा राष्ट्रीय महिला आयोग के महत्वपूर्ण कार्यों में शामिल है। आयोग ने इस वर्ष POSH Act की समीक्षा के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में परामर्श आयोजित कर विशेषज्ञों की राय ली है। इसी तर्ज पर अब विभिन्न राज्यों में महिलाओं से जुड़े राज्य-विशिष्ट कानूनों की समीक्षा की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस प्रक्रिया में यह देखा जाएगा कि कानूनों में कोई कमी या कानूनी खामी तो नहीं है, उनके क्रियान्वयन में क्या परेशानियां आती हैं और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच जरूरी समन्वय मौजूद है या नहीं। विचार-मंथन से सामने आने वाली सिफारिशों का दस्तावेजीकरण कर उन्हें महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार को सौंपा जाएगा। इन सिफारिशों का इस्तेमाल नए कानून बनाने, मौजूदा कानूनों में संशोधन तथा दिशा-निर्देश और नीतियां तैयार करने में किया जा सकता है। कार्यक्रम में अधिवक्ता पुनीत चतुर्वेदी और रुपाली गोठवाल ने महिलाओं के संपत्ति और कृषि भूमि संबंधी अधिकारों पर मार्गदर्शन किया। न्यायमूर्ति प्रवीण कुंभोजकर ने वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े विवा

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