
मुंबई। महाराष्ट्र स्कूल शिक्षा विभाग ने एक अहम और सख्त निर्णय लेते हुए राज्य के 324 सेकेंडरी स्कूलों और 412 जूनियर कॉलेज डिवीज़नों को सरकारी वेतन अनुदान के लिए हमेशा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है। यह कदम उन संस्थानों के खिलाफ उठाया गया है, जो पिछले कई वर्षों में बार-बार अवसर और समय-सीमा में छूट मिलने के बावजूद निर्धारित मानकों को पूरा नहीं कर सके। 2 अप्रैल 2026 को जारी सरकारी प्रस्ताव के अनुसार, ये संस्थान अब तक बिना सरकारी अनुदान के संचालित हो रहे थे और उनसे अपेक्षा की गई थी कि वे आवश्यक शर्तें पूरी कर अनुदान के पात्र बनेंगे। इन शर्तों में कर्मचारियों का सही रिकॉर्ड रखना, योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करना और शैक्षणिक व प्रशासनिक मानकों का पालन करना शामिल था। राज्य सरकार 2011 से ही विभिन्न चरणों में इन संस्थानों का मूल्यांकन कर रही थी, लेकिन लंबी प्रक्रिया के बावजूद कई स्कूल तय मानकों तक नहीं पहुंच पाए। इस निर्णय का सबसे अधिक प्रभाव मुंबई महानगर क्षेत्र पर पड़ेगा, जिसमें ठाणे, पालघर और रायगढ़ जैसे जिले शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक 68 स्कूल ठाणे में प्रभावित हुए हैं, जबकि मुंबई में 54, पालघर में 46, पुणे में 26, रायगढ़ में 21 और नासिक में 19 स्कूल इस फैसले की चपेट में आए हैं। इसके अलावा जलगाँव, नंदुरबार, सोलापुर और धुले जैसे जिलों में भी कई संस्थान प्रभावित हुए हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि ये संस्थान नए सिरे से मान्यता प्राप्त करने में असफल रहते हैं, तो उनके लाइसेंस रद्द किए जा सकते हैं। सभी प्रभावित स्कूलों को 30 अप्रैल 2026 तक ‘स्व-वित्तपोषित’ (Self-Financed) श्रेणी के तहत मंजूरी के लिए आवेदन करना अनिवार्य होगा। छात्रों की शिक्षा प्रभावित न हो, इसके लिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि 1 मई से 31 मई के बीच इन स्कूलों के विद्यार्थियों को नजदीकी सरकारी या अनुदानित संस्थानों में स्थानांतरित किया जाए। इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए राज्य प्रधानाचार्य संघ के पूर्व उपाध्यक्ष महेंद्र गणपुले ने सरकार के कदम की आलोचना की। उनका कहना है कि ये संस्थान संचालित होने के बावजूद अनुदान के मानकों को पूरा नहीं कर पाए, लेकिन अब उन्हें ‘स्व-वित्तपोषित’ श्रेणी में लाने का निर्देश देने से एक जटिल स्थिति पैदा हो गई है, जहां संस्थान दोहरी मंजूरी प्रणाली के तहत काम करने को मजबूर हो सकते हैं। शिक्षा विशेषज्ञों ने भी चिंता जताई है कि वित्तीय सहायता खत्म होने से इन संस्थानों की गुणवत्ता, बुनियादी ढांचा और दीर्घकालिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा।




