Friday, February 13, 2026
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दृष्टिकोण: स्वास्थ्य सेवाओं को पंगु बनाने का खेल

डॉ.सुधाकर आशावादी
किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए आम नागरिक को प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं का निपुण चिकित्सकों द्वारा संचालित किया जाना अपेक्षित होता है। अक्षम और अयोग्य चिकित्सकों के भरोसे स्वास्थ्य सेवाओं को नहीं छोड़ा जा सकता। चिकित्सकों को विशेष रोगों का विशेषज्ञ बनाने के लिए एम.डी. व एम.एस.पाठ्यक्रम में प्रवेश की व्यवस्था है, जिसका माध्यम नीट परीक्षा उत्तीर्ण करना है, जिसमें प्रवेश के लिए अर्हता के मापदंड पूर्व निर्धारित हैं, जिनके अनुसार अनारक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों हेतु पचास प्रतिशत तथा आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों हेतु चालीस प्रतिशत अंक अनिवार्य थे। इस बार पीजी पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु निर्धारित सीटें न्यूनतम अर्हता पूरी न कर पाने के कारण रिक्त रहने का अनुमान है, जिसके चलते स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सामान्य वर्ग के लिए पर्सेंटाइल पचास प्रतिशत से घटाकर सात प्रतिशत तथा आरक्षित वर्ग के लिए चालीस प्रतिशत से घटाकर शून्य पर्सेंटाइल कर दिया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय भले ही उक्त मानक घटाने के लिए पर्सेंटाइल में कमी को उचित ठहराए, मगर सामान्य समझ का कोई भी व्यक्ति इस निर्णय को तर्कसंगत करार नहीं दे सकता। स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता, फिर सात प्रतिशत या शून्य पर्सेंटाइल पर पीजी में प्रवेश को तर्कसंगत कैसे ठहराया जा सकता है? विचारणीय बिंदु यह भी है कि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आवश्यक जनोपयोगी सेवाओं में निपुणता के मानक पूरे किया जाना ही मुख्य प्राथमिकता होनी चाहिए, फिर आरक्षण जैसी विकलांगता से इन सेवाओं को पंगु बनाने का औचित्य ही क्या है, यदि एक बार इस प्रकार की छूट प्रदान करके बिना उचित अर्हता के अभ्यर्थियों को पीजी में प्रवेश दिया गया, तो क्या गारंटी है, कि कोई अक्षम चिकित्सक जनमानस का समुचित उपचार करने में समर्थ होगा? विडंबना यही है, कि आरक्षण की विकलांगता को इसी प्रकार के अतार्किक निर्णयों से पोषित किया जा रहा है, कहीं शून्य अंक प्राप्त करने वाले व्यक्ति को विषय विशेषज्ञ बताकर शिक्षक बनाया जा रहा है, तो कहीं चिकित्सा जैसे जीवन से जुड़े गंभीर विषय का मखौल उड़ाने से भी परहेज नहीं किया जा रहा है। ऐसे में आवश्यक है, कि जनमानस के जीवन से जुड़े गंभीर मुद्दों को गंभीर मानते हुए ही निर्णय लिए जाएं तथा देश के स्वास्थ्य एवं शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर गुणवत्ता के विरुद्ध कोई भी समझौता न किया जाए। नीट पीजी की परीक्षा में न्यूनतम अर्हता प्राप्त न करने वाले अभ्यर्थियों को पीजी पाठ्यक्रम में प्रवेश देने के लिए दी गई इस छूट पर पुनर्विचार किया जाए। अन्यथा स्वास्थ्य सेवाओं को पंगु बनाने की दिशा में स्वास्थ्य मंत्रालय का यह निर्णय राष्ट्र घातक सिद्ध होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है।

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