पुस्तक चर्चा- अनिकेत: शून्यता की ओर एक पदयात्रा

विवेक रंजन श्रीवास्तव
अनिल कुमार अस्थाना का उपन्यास “अनिकेत : शून्यता की ओर एक पदयात्रा” पहली दृष्टि में एक सत्तर वर्षीय व्यक्ति की हिमालय-यात्रा  कथा प्रतीत होता है, लेकिन गहराई से पढ़ने पर यह यात्रा बाहर से अधिक लेखक का आंतरिक संवाद है। यह 10 छोटे अध्यायों में, लगभग 60 पृष्ठ पर फैली हुई रोचक लंबी कहानी है। पात्र अधिक नहीं हैं। आत्म संवाद ही कथानक है। केंद्रीय पात्र अनिकेत एक विद्युत अभियंता और प्रशासक रहा है। उसने जीवन का बड़ा हिस्सा जिम्मेदारियों, पद, परिवार और व्यवस्था को संभालते हुए बिताया है।  सत्तर वर्ष की उम्र में उसकी पारिवारिक दुनिया पूरी तरह व्यवस्थित है। अगली पीढ़ी अपनी जिम्मेदारी संभाल रही है। कोई पारिवारिक कलह नहीं, कोई आर्थिक संकट नहीं, कोई संघर्ष नहीं है। फिर भी अनिकेत के भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है, क्या जीवन की पूर्णता के बाद भी कोई ऐसी यात्रा शेष है, जो मनुष्य को स्वयं से मिलवा सके? यही प्रश्न ‘अनिकेत’ को जन्म देता है। उसका शरीर जबलपुर में रहता है, लेकिन उसका अवचेतन हिमालय की यात्रा पर निकल पड़ता है। वह बिना किसी निश्चित योजना के रेल और बस से उत्तराखंड के पहाड़ों तक पहुँचता है। मंदिर, विद्यालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और गुरुद्वारे से होते हुए वह साधारण मनुष्यों के जीवन और सेवा में एक अलग प्रकार की आध्यात्मिकता पहचानता है। नदी के किनारे बैठकर वह समय को बहते जल की तरह देखता है। धीरे-धीरे उसका साक्षी भाव गहरा होता जाता है। वह तकनीक और अपनी डिजिटल डायरी  के मोह को पहचानता है और अंततः स्मार्टफोन तक से मुक्त हो जाता है।  इसके साथ उसकी यात्रा भौतिक भूगोल से हटकर, आत्मिक खोज में प्रवेश करती है। हिमालय की बर्फ, मौन, तूफान और अंधेरी गुफा उसके भीतर के अहंकार, स्मृतियों और पहचान के आवरणों को एक-एक कर हटाते हैं। गुफा में उसे अद्वैत का अनुभव होता है। वह मैं से मुक्त होकर शून्यता में प्रवेश करता है। फिर वह वापस नीचे लौटता है, बाजार, तीर्थयात्रियों, साधु और आम लोगों के बीच से गुजरता है, लेकिन अब संसार उसे प्रभावित  नहीं कर पाता। अंततः देवदार के वृक्ष के नीचे पंचतत्वों में उसका विलय हो जाता है। इसके साथ कथा का  सुंदर रहस्य खुलता है। अनिकेत की पूरी हिमालय-यात्रा लेखक के भीतर घट रही थी। लेखक स्वयं जबलपुर के अपने अध्ययन-कक्ष में बैठा था। देह ने घर नहीं छोड़ा था, लेकिन मन ने वानप्रस्थ की यात्रा पूरी कर ली थी। हाल ही चर्चित फिल्म हनुमान अंश की कहानी में भी बताया गया है कि माँ की मृत्यु पर बच्चे को बताया जाता है कि माँ राम के घर चली गई है । माँ को ढूंढने का बच्चे का प्रयास  किस तरह अंततोगत्वा अंतर मन में राम तत्व की खोज सिद्ध होती है। इस कथा को भी हिंदी साहित्य की उस धारा में  देखना रोचक है,जिसमें बाहरी यात्रा वास्तव में आत्म-अन्वेषण की यात्रा बन जाती है। याद आता है कि निर्मल वर्मा का अंतिम उपन्यास अंतिम अरण्य पढ़ा था । उसमें भी पहाड़, वृद्धावस्था, मृत्यु, स्मृति, एकांत और जीवन के अंतिम पड़ाव का प्रश्न उठाया गया है। आलोचनात्मक अध्ययनों में अंतिम अरण्य को निर्मल वर्मा की मृत्यु और वृद्धावस्था से गहरी मुठभेड़ करने वाली कृति माना गया है। वहाँ मृत्यु एक घटना भर नहीं, बल्कि जीवन को देखने का नया कोण बनती है।  अंतर यह है कि निर्मल वर्मा के उपन्यास का वातावरण अधिक रहस्यात्मक, मनोवैज्ञानिक और अस्पष्ट है, जबकि इस कृति में अनिकेत अपने आध्यात्मिक निष्कर्षों को कहीं अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखता है। भारतीय दार्शनिक आधार पर देखें तो उपन्यास का ‘साक्षी भाव’, ‘समत्व’, ‘अहं का विसर्जन’ और ‘अद्वैत’ सीधे गीता की उस दृष्टि से संवाद करते हैं जिसमें कहा गया है, “समत्वं योग उच्यते।”  इस अर्थ में उपन्यास परंपरा से विमुख नहीं, बल्कि उसे आधुनिक तकनीकी और पारिवारिक जीवन के बीच पुनर्परिभाषित करने का समकालीन प्रयास है। इस उपन्यास की  विशेषता उसका आधुनिक वानप्रस्थ का विचार है। लेखक ने वानप्रस्थ को जंगल चले जाने या परिवार से संबंध तोड़ लेने के रूप में नहीं रखा। यहाँ असली त्याग सत्ता और नियंत्रण का त्याग है। जो गीता की शिक्षा है। अनिकेत अपने बच्चों को निर्देश देना बंद करता है। वह मान लेता है कि नई पीढ़ी अपने निर्णय स्वयं ले सकती है। यह प्रसंग आज के भारतीय परिवार के संदर्भ में विशेष अर्थ रखता है। बुजुर्गों की समस्या हमेशा उपेक्षा नहीं होती, कभी-कभी समस्या यह भी होती है कि वे अपने अनुभव को अगली पीढ़ी पर अधिकार के रूप में थोपते रहते हैं। उपन्यास इस मनोविज्ञान को सत्ता का सहज हस्तांतरण कहता है। यह शब्द-योजना कृति की आधुनिकता को रेखांकित करती है। इसे पढ़ने से यह भी लगा कि लेखक ने अपने स्वयं को अनिकेत के रूप में प्रस्तुत किया है। सुगम कथ्य के लिए भाव यात्रा का सहारा लिया गया है, तथा शायद खुद को ही सरल तरीके से वानप्रस्थ समझाने का प्रयास कृति के माध्यम से किया गया है। विद्युत अभियंता के जीवन से लिए गए ग्रिड,वोल्टेज,रेजिस्टेंस, शटडाउन और क्लाउड जैसे तकनीकी शब्द कई जगह नवाचारी रोचक साहित्यिक प्रतीक बन जाते हैं। जिस व्यक्ति ने जीवन भर बाहरी ऊर्जा-प्रवाह को नियंत्रित किया, वही अंततः अपने भीतर के अहंकार के ग्रिड को बंद करता है। यह रूपक इस उपन्यास की मौलिक साहित्यिक उपलब्धियों में गिना जा सकता है। तकनीक और वैराग्य का संबंध भी पुस्तक को समकालीन बनाता है। अनिकेत आरंभ में स्मार्टफोन और वॉइस-टू-टेक्स्ट के माध्यम से अपनी यात्रा दर्ज करता है। वह डिजिटल क्लाउड को आधुनिक ताड़पत्र की तरह देखता है। लेकिन पहाड़ी गड़रिए का एक सहज प्रश्न उसकी पूरी बौद्धिक व्यवस्था को हिला देता है, “हमें खुद को याद रखने की क्या जरूरत?” यह छोटा-सा संवाद पुस्तक के प्रभावशाली प्रसंगों में है। मुझे बौद्ध भिक्षुओं द्वारा सुदीर्घ मेहनत से बनाई जाने वाली मंडलाकार रंगोली और फिर पल भर निहारकर उसे मिटा देने की परम्परा का स्मरण हो आया। अनिकेत समझता है कि अनुभव को सुरक्षित रखने की इच्छा के भीतर स्वयं को अमर कर लेने का सूक्ष्म अहंकार भी छिपा हो सकता है। अंततः उसका फोन से भी साथ छूट जाता  है और उसके साथ लेखक, मार्गदर्शक और विरासत छोड़ने की इच्छा भी जैसे समाप्त हो जाती है। उपन्यास यहाँ एक दिलचस्प दार्शनिक विरोधाभास रचता है, जिस व्यक्ति ने जीवन भर सब कुछ व्यवस्थित किया, वही अंत में जानता है कि सत्य को संग्रहित नहीं किया जा सकता। नदी वाला प्रसंग भी कलात्मक है। अनिकेत देखता है कि नदी का जल हर क्षण बदल रहा है, लेकिन नदी बनी रहती है। इसी से वह निष्कर्ष निकालता है कि मनुष्य का दुख केवल समय बीतने से नहीं, बल्कि उसे रोक लेने की इच्छा से पैदा होता है। यह विचार वृद्धावस्था और स्मृति के भारतीय संदर्भ में देखा जा सकता है। इसी तरह हिमालयी फूल और कांटे का प्रसंग समत्व को दृश्य प्रतीक में व्यक्त करता है। फूल को सुंदर और कांटे को कुरूप मानने के बजाय अनिकेत दोनों को प्रकृति की समान अभिव्यक्तियाँ देखता है। गीता का “समत्वं योग उच्यते” यहाँ किसी शास्त्रीय उद्धरण से आगे बढ़कर कथा की यथार्थ अनुभूति बन जाता है। उपन्यास की कुछ लेखकीय सीमाएँ भी नजर आती हैं। कई स्थानों पर पात्र की अनुभूति संवाद या कथा की स्वाभाविक गति के बजाय दार्शनिक व्याख्या तथा उपदेश में बदल जाती है। शून्यता, अद्वैत, साक्षी, जीवनमुक्ति और माया जैसे विचार बार-बार स्पष्ट किए जाते हैं। यहां साहित्यिक दृष्टि से पाठक को स्वयं अर्थ खोजने की गुंजाइश बेहतर प्रभाव छोड़ता। इसी कारण जहाँ निर्मल वर्मा का लेखन संकेतों, मौन और अस्पष्टता से पाठक को सहभागी बनाता है, वहाँ अनिकेत में निष्कर्षों को अधिक प्रत्यक्ष ढंग से समझाया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य रहस्य पैदा करना नहीं, एक आधुनिक आध्यात्मिक अनुभव को सरल भाषा में पाठक तक पहुँचाना है और शायद पाठक से पहले स्वयं अपने आप को समझाना है। लेखक स्वयं इस संदर्भ को एक ऐसे प्रश्न का विस्तार मानता है जो किसी गृहस्थ के मन में उठते हैं, “क्या होगा यदि मैं सब कुछ छोड़ दूँ? कुल मिलाकर “अनिकेत : शून्यता की ओर एक पदयात्रा” को केवल हिमालय-यात्रा का उपन्यास कहना इसके मूल आशय को कम आंकना होगा। यह उपन्यास वृद्धावस्था को अवसान नहीं, आत्म-पहचान के एक नए अवसर के रूप में देखता है।  महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें लेखक अंततः अपने पात्र को हिमालय में नहीं छोड़ता। वह उसे वापस उसी घर में ले आता है जहाँ पत्नी है, बच्चे हैं,चाय का कप है, लैपटॉप है और जीवन का सामान्य कोलाहल है। परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर हुआ है। यही इस उपन्यास का केंद्रीय कथ्य है। वानप्रस्थ देह का नहीं, दृष्टि का परिवर्तन है। उपन्यास की अंतिम पंक्तियों में ‘पूर्ण’ से ‘पूर्ण’ के बच जाने की उपनिषदिक अनुभूति इसी विचार को समेटती है। मेरे लिए इस पुस्तक की सबसे सार्थक पंक्ति वही है जो इसकी पूरी यात्रा को एक सूत्र में बाँध देती है, घर में रहते हुए भी मनुष्य अपने भीतर एक ऐसा भव्य आकाश खोज सकता है, जहाँ उसका ‘मैं’ धीरे-धीरे परम शक्ति में विलीन होता जाए। इस अर्थ में अनिकेत किसी हिमालय की ओर जाने का निमंत्रण नहीं, अपने ही भीतर की देहरी पर ठहरने और स्व के विसर्जन का आग्रह है। आज के शोर भरे समय में यही सबसे जरूरी है।

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