मानखुर्द के लॉज से 16 वर्षीय नाबालिग रेस्क्यू, देह व्यापार में धकेले जाने का आरोप

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बिनु वर्गीस की सूचना पर पुलिस की कार्रवाई; 22 वर्षीय महिला गिरफ्तार, बिना पहचान पत्र नाबालिग को ठहराने में लॉज प्रबंधन की भूमिका की भी जांच

इंद्र यादव/मुंबई। क्या चंद रुपयों के लिए किसी मासूम का बचपन भी सौदे की वस्तु बन सकता है? मुंबई के मानखुर्द इलाके से सामने आए एक गंभीर मामले ने यही सवाल खड़ा कर दिया है। यहां एक लॉज से 16 वर्षीय नाबालिग को पुलिस ने रेस्क्यू किया है। आरोप है कि बच्ची को देह व्यापार में धकेला जा रहा था। मामले में 22 वर्षीय महिला को कथित दलाल के रूप में गिरफ्तार किया गया है, जबकि संबंधित लॉज की भूमिका की भी जांच की जा रही है। मामला मानखुर्द स्थित ‘साई पूजा लॉजिंग एंड बोर्डिंग’ का बताया गया है। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बिनु वर्गीस को नाबालिग के कथित तौर पर देह व्यापार में इस्तेमाल किए जाने की जानकारी मिली थी। इसके बाद उन्होंने मामले की सूचना डीसीपी समीर शेख को दी। सूचना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस हरकत में आई और पीआई स्वाति जगताप की टीम ने संबंधित लॉज पर कार्रवाई की। पुलिस टीम ने वहां से 16 वर्षीय नाबालिग को सुरक्षित रेस्क्यू किया। बाल यौन शोषण और मानव तस्करी जैसे संवेदनशील मामलों में पीड़ित नाबालिग की पहचान उजागर नहीं की जा सकती, इसलिए उससे संबंधित किसी भी पहचान योग्य जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।पुलिस कार्रवाई के दौरान 22 वर्षीय महिला की कथित भूमिका सामने आने के बाद उसे गिरफ्तार किया गया। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि नाबालिग वहां कैसे पहुंची, उसे कौन लेकर आया, इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क सक्रिय है या नहीं और इससे पहले भी इस तरह की गतिविधियां वहां हुई थीं या नहीं। मामले का एक और गंभीर पहलू संबंधित लॉज में नाबालिग के ठहरने से जुड़ा है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, यह जांच की जा रही है कि क्या 16 वर्षीय बच्ची को बिना वैध पहचान संबंधी औपचारिकताओं के लॉज में प्रवेश और कमरा उपलब्ध कराया गया था। यदि जांच में नियमों का उल्लंघन या जानबूझकर अपराध को सुविधा उपलब्ध कराने की बात सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है। हालांकि जांच पूरी होने से पहले लॉज मालिक अथवा प्रबंधन की आपराधिक मिलीभगत को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। पुलिस उपलब्ध दस्तावेज, रजिस्टर, सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों के आधार पर उनकी भूमिका की पड़ताल कर रही है। इस कार्रवाई में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बिनु वर्गीस की समय पर दी गई सूचना महत्वपूर्ण रही। संवेदनशील जानकारी सीधे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों तक पहुंचने और उसके बाद तत्काल कार्रवाई होने से नाबालिग को सुरक्षित निकाला जा सका। लेकिन यह मामला केवल एक गिरफ्तारी या पुलिस रेड तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि 16 साल की बच्ची ऐसी स्थिति तक पहुंची कैसे? यदि उसके पीछे कोई नेटवर्क है तो उसकी पूरी श्रृंखला सामने आना जरूरी है—नाबालिग को लाने वाले से लेकर उससे आर्थिक लाभ उठाने वाले प्रत्येक व्यक्ति तक। होटल और लॉज संचालकों की जिम्मेदारी भी ऐसे मामलों में बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अतिथियों की पहचान संबंधी निर्धारित प्रक्रिया का पालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मानव तस्करी, नाबालिगों के यौन शोषण और दूसरे अपराधों को रोकने की एक अहम सुरक्षा व्यवस्था है। नाबालिग को सुरक्षित निकाल लिया जाना राहत की बात है, लेकिन असली कार्रवाई तब पूरी मानी जाएगी जब जांच इस कथित नेटवर्क की जड़ तक पहुंचे और यदि किसी भी स्तर पर अपराध में सहयोग या संलिप्तता साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के तहत कड़ी कार्रवाई हो।

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