
पवन वर्मा
हमारे लोकजीवन, लोकाचार और लोकसाहित्य में गणेशजी को मंगलदाता एवं विघ्न-विनाशक के रूप में स्मरण किया जाता है। मंगलमूर्ति गणेशजी हमारे लोकजीवन में पूर्णरूप से रमे हुए हैं। सर्वपूज्य, परम पूज्य और कुशलता के प्रतीक हैं। वे समस्त ऋद्धियों और सिद्धियों के दाता हैं। मोदकप्रिय होने से उन्हें ‘मोदकप्रिय मुद मंगलदाता’ कहा गया है। लोकजीवन में गणेशजी इतने समाविष्ट हैं कि हम कोई भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए ‘श्री गणेश कीजिये’ कहते हैं। ‘श्री गणेश करना’ एक मुहावरा बन गया है। यात्रा पर जाते समय ‘जय सिद्धि गणेश’ कहते हैं और गणेशजी हमारी यात्रा मंगलमय करते हैं। गृहप्रवेश, विद्या आरंभ करते समय गणेशजी का स्मरण, पूजन और अर्चना की जाती है, उनकी स्थापना की जाती है। ऐसा लोकविश्वास है कि गणेशजी की पूजा करने से हमारी समस्त विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। अत: अनेक शुभकारी नामों को धारण करने वाले गजानन गणेश के पूजन की परम्परा भारतीय लोकजीवन में सनातन और अखंड है। समाज में, परिवार में या मंदिरों में उनकी पूजा-अर्चना को मांगलिकता का प्रतीक माना जाता है। यह लोकमान्यता है कि वह शीघ्र शुभ फलदाता देवता हैं और उनके दर्शन मात्र से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। अत: पर्वो, समारोहों, सहभोजों, यात्रागमन आदि अवसरों पर प्रथम पूज्य गणेशजी की पूजा-अर्चना की जाती है। यद्यपि दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा का विधान है, लेकिन शुभ और लाभ के दाता तो गणेशजी ही हैं, अत: लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की मूर्ति मिलती है तथा युगलमूर्ति की पूजा की जाती है। संस्कार समारोहों में जहां माता गौरी की स्थापना की जाती है, वहीं जलभरे कलश या मंगल कलश में गणेशजी की प्रतिमा रखी जाती है। यह प्रतिमा मिट्टी या गौ के गोबर से बनायी जाती है। इस प्रकार गौरी-गणेश पूजन के बाद ही मंगल कार्य सम्पन्न किया जाता है। विद्या आरंभ करते समय बालक से ‘श्री गणेशाय नम:’ लिखवाया जाता है। सेठ-साहूकार अपने बहीखातों में भी प्रारंभ में ‘श्री गणेशाय नम:’ लिखते हैं।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पावन पर्व गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में उसे ‘बहुल चौथ’ के रूप में मनाया जाता है। अवधी भाषा में बहुरा या बहुला का अभिप्राय: ‘गया हुआ’ होता है, अर्थात जिसके आने की उम्मीद न हो। गणेशजी की उत्पत्ति भी इसी प्रकार हुई थी। उनका सिर कट गया था और फिर हाथी का सिर लगाये जाने पर पुनर्जीवित हुए। लोकमानस ने इस पर्व का नाम इस प्रकार रखकर गणेश जन्म के पौराणिक तथ्य को सहजता से निरूपित किया है। स्कंदपुराण में श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की विशेष महिमा है। उस दिन की आराधना से गणेशजी अपने आराधकों के समस्त कार्यकलापों में सिद्धि प्रदान करते हैं। अत: उनका नाम ‘सिद्धि-विनायक’ हो गया है-
सिद्धियन्ति सर्व कार्यणि मनसा चिन्तिातन्यपि।
तेन ख्याति गतो लोके, नाम्ना सिद्धि विनायक॥
महात्मा तुलसीदास जी कृत गणेश स्तुति तो समस्त जनजीवन में व्याप्त है।
गाइए गणपति जगवंदन, शंकर सुवन भवानी के नंदन।
सिद्धि सदन गजवदन विनायक, कृपा सिन्धु सुंदर सब लायक।
गणेशजी पांच तत्वों से समन्वित रूप हैं। ये पांच तत्व हैं- पराक्रम, आनंद, बुद्धि, कृषि और व्यवसाय। नेतृत्व के गुणों के कारण उन्हें गणपति, गणाधिपति, गणधिप, गणेश आदि नामों से पुकारा जाता है। उनका दूसरा रूप विघ्नहर्ता और मंगलदाता है। वे बुद्धि के निधान और पराक्रम के पुंज हैं। बुद्धिबल से ही वे विश्व में प्रथम पूज्य हैं। वे जल तत्व के अधपति हैं और जल ही जीवन हुआ करता है। अत: लोकजीवन में उनकी महान प्रतिष्ठा है। वाणिज्य व्यवसाय के प्रबंधन के रूप में उनकी मान्यता है, इसीलिए वणिक व्यवसाय के लोग उन्हें अधिक पूजते हैं। गणेशजी की पूजा न केवल भारत में प्रचलित हैं, बल्कि पड़ोसी देशों में, अतिरिक्त सुदूर देशों में भी समान रूप से प्रचलित है। गणेशोत्सव इसीलिए हमारे देश के जनगण की धार्मिक आस्था का प्रतीक है। गणपति सर्वाधिक लोकमान्य और सर्वप्रिय देवता हैं। वे सर्व सुखदाता-दुखहर्ता, सांसारिक सम्पदा देने वाले हैं। वे समाज का नेतृत्व करने वाले कुशल संगठक तथा महासेनापति भी हैं। पौराणिक युग में गण के नाम से जाने जाते समाज के विभिन्न बिखरे हुए हिस्सों को एकत्र कर उनमें एकता का गणेशजी ने सफल प्रयास किया। श्री गणेशजी हमारे सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक-पुरुष रहे हैं। श्री गणेशजी हमारे आद्यदेव और सर्वमान्य गणनायक के रूप में हमेशा पूज्य और प्रतिष्छित रहे हैं। लोकमान्य तिलक ने गणेशजी की सामाजिक महत्ता को पहचानकर और गणेश पूजा को व्यापक रूप देकर राष्ट्रीय चेतना जगाने का सफल प्रयास किया। उन्होंने गणेशोत्सव को सामाजिक और राष्ट्रीय संदर्भों से जोड़ा। ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयघोष से सारा राष्ट्र गुंजायमान हो जाता हैं। गणेशोत्सव पर सांस्कृतिक आयोजनों से हमें राष्ट्र की अखंडता, एकता और प्रभुता सम्पन्न गणराज्य की समृद्धि से अभिवृद्धि करने की प्रेरणा मिलती है। मंगलमूर्ति गणेश हमारे लोकजीवन में समन्वय के प्रतीक हैं। वे हमारे दैनिक जीवन के आस्था-विश्वासों में इतने घुल-मिल गये हैं कि मंगलदायक गणेशजी के प्रति हमारी श्रद्धाभक्ति अनन्यता की सीमा लांघ चुकी है। आद्यकवि वाल्मीकि जी ने गणेशजी का स्तवन इस प्रकार किया है- हे गणेश्वर। आप चौंसठ कोटि विद्याओं के दाता हैं, ज्ञाता हैं। देवताओं के आचार्य बृहस्पति को भी विद्या प्रदान करने वाले हैं। कठोपनिषद् रूपी अभीष्ठ विद्या के दाता हैं। आप विघ्नराज हैं, विघ्ननाशक हैं। आप गजानन हैं, वेदों के सारतत्व हैं। असुरों का संहार करने वाले हैं। इस प्रकार हमारे लोकाचार से लेकर लोक व्यवहार में श्री गणेशजी समाहित हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में लोकदेवता गणेशजी की स्तुति में कहा गया है- ‘जो परमधाम, परमब्रह्म, परेश, परमेश्वर, विघ्नों के विनाशक, शान्त, पुष्ट, मनोहर एवं सुर-असुर और सिद्ध जिनका स्तवन करते हैं, जो देवरूपी कमल के लिए सूर्य और मंगल के समान हैं, उन पर परात्पर गणेश की मैं स्तुति करता हूं।