
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि कानून बनाना संसद का अधिकार है। वे चाहते हैं कि सज्जन व्यक्ति चुनकर सदन में आएं। यह विचार निःसंदेह प्रशंसनीय है और सराहना योग्य है, परंतु आज संसद भ्रष्टाचारियों, माफियाओं, गुंडों और बदमाशों से भरी पड़ी है, जिन पर महिलाओं के साथ बलात्कार, हत्या जैसे संगीन अपराध के मामले दर्ज हैं। जिस सदन में अपराधी प्रवृत्ति के लोग होंगे, उनसे मनन-चिंतन और निष्पक्ष सोच की आशा कैसे की जा सकती है? भ्रष्टाचारियों को सत्ता ने अपने में शामिल कर लिया है, उनसे निष्पक्ष और जनहितकारी कानून की आशा कैसे की जाए? लोकतंत्र का सबसे बड़ा दोष बहुमत का दंभ है। इसी संसद ने स्वार्थवश सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को चुनौती देने वाले कानून बनाए हैं। सुप्रीम कोर्ट संविधान से बंधा है और उसी के दायरे में निर्णय देता है, परंतु बहुमत वाली सत्ता उनके निर्णयों का सम्मान नहीं करती।
आपका कहना कि सज्जन व्यक्ति संसद में आएं, बिल्कुल उचित है, लेकिन हकीकत यह है कि राजनीतिक दलों ने राजनीति को व्यापार बना दिया है। आज चुनाव इतना खर्चीला हो गया है कि सामान्य ईमानदार व्यक्ति उसका सपना भी नहीं देख सकता। छोटे से ग्राम पंचायत चुनाव में ही प्रत्याशी आठ-दस लाख रुपये खर्च करता है, शराब और पैसे से वोट खरीदे जाते हैं। इसी अनुपात से संसदीय चुनाव में पचास करोड़ रुपये तक खर्च करना पड़ता है। भारतीय लोकसभा चुनाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव से भी महंगा हो गया है। पूंजीपति चुनाव में अरबों रुपये झोंकते हैं और चुनाव जीतने के बाद सत्ताधारी दल उन्हीं के हित साधने में लग जाते हैं। सरकारें पूंजीपतियों के निवेश को भारी ब्याज सहित लौटाने में जुट जाती हैं, क्योंकि उन्हें अगला चुनाव भी लड़ना होता है।
ईमानदार और सज्जन व्यक्ति के पास चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपये आएंगे कहां से? पूंजीपतियों से चंदा लेने वाले दल पूंजीपतियों के गुलाम बन जाते हैं। सरकार का उद्देश्य जनता को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक न्याय देना होना चाहिए, परंतु गुलाम सत्ता पूंजीपतियों के निर्देश पर बजट बनाती है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और नगरीय सुविधाओं पर बजट में कटौती कर दी जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था कि पहले अपराधी हमारे पास अपने बचाव के लिए आते थे, बाद में हम चुनाव जीतने के लिए उनसे सहायता लेने लगे, और फिर वे राजनीति में अपनी शक्ति से जम गए। सिंगापुर के प्रधानमंत्री ने भी कहा था कि नेहरू के भारत को अपराधियों का भारत बना दिया गया है। आज अपराधियों का काम चुनाव आयोग और ईवीएम ने संभाल लिया है। जीवित मतदाताओं को मृतक दिखाकर उनके नाम काट दिए जाते हैं, फर्जी वोटर बनाए जाते हैं। ट्रंप और एलन मस्क तक ने कहा है कि जब सैटेलाइट को धरती से नियंत्रित किया जा सकता है, तब ईवीएम हैक क्यों नहीं हो सकती? सज्जन व्यक्ति चुनकर आएं, यह तभी संभव है जब इसके लिए सख्त कानून बनें। चुनाव लड़ने से पहले एसक्यू परीक्षा में न्यूनतम 60 अंक अनिवार्य किए जाएं। एसक्यू यानी चेतनात्मक क्षमता रखने वाले ही न्यायप्रिय, सत्यनिष्ठ और ईमानदार हो सकते हैं। पीक्यू या आईक्यू वाले कभी भी सच्चे नेतृत्वकर्ता नहीं हो सकते। ईक्यू वाले संवेदनशील होते हैं, प्रशासनिक पदों के लिए योग्य हो सकते हैं, पर नेतृत्व के लिए एसक्यू अनिवार्य है। आज राजनीति में घृणा, जातिवाद, धर्मवाद और भेदभाव फैलाकर वोट बैंक बनाया जाता है। सत्ता आईटी, सीबीआई और ईडी का दुरुपयोग कर विपक्ष को कुचलती है। आलोचना करने पर तिलमिला जाती है, ईवीएम हैकिंग के बावजूद विपक्षी वोटरों के नाम कटवाए जाते हैं। बिहार के 65 लाख मतदाताओं को मृत या स्थानांतरित दिखाकर मतदान से वंचित कर दिया गया।
घुसपैठियों के नाम पर अपने ही देश के नागरिकों को उजाड़ा जाता है। कारण स्पष्ट है—अयोग्य और भ्रष्ट लोगों का राजनीति पर कब्जा। प्रशासकों का चयन भी केवल आईक्यू पर आधारित होता है, जबकि प्रशासन में ईक्यू आवश्यक होना चाहिए। सरकार और प्रशासन को जनता को प्रजा समझना बंद करना होगा। ब्रिटेन की तरह जनता को न केवल वोट देने बल्कि प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार देना होगा। भागवत जी कहते हैं कि आरएसएस केवल राय देती है, काम करना सरकार का दायित्व है। लेकिन जब सरकार में दो-तिहाई लोग आरएसएस से जुड़े हैं, तो उनका अनुशासन कहां चला गया? सच तो यह है कि सरकार ने आरएसएस को बौना कर दिया है। अन्यथा यह क्यों कहा जाता कि अब हमें आरएसएस की जरूरत नहीं है? जो अपने मातृ संगठन के प्रति वफादार नहीं, वह जनता और देश का क्या होगा?