मुख्यमंत्री के 100 डेज कार्यक्रम के प्रमाणपत्र वितरण में ‘घपलेबाजी’

FDA परिमंडल-5 ने हासिल किया था प्रथम स्थान, लेकिन हक का प्रमाणपत्र आज तक नहीं मिला
जिलाधिकारी आंचल सूद गोयल के हाथों अन्न विभाग की अनुपमा पाटिल को कैसे मिला प्रमाणपत्र, नाम किसने भेजा, किसने सत्यापित किया और FDA को सूचना क्यों नहीं मिली?

मुंबई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश पर महाराष्ट्र सरकार द्वारा चलाए गए 100 दिवसीय कार्यालयीन सुधार कार्यक्रम में प्रथम स्थान के प्रमाणपत्र के वितरण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक जिला स्तरीय कार्यालय समूह में खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के मुंबई मंडल के सहायक आयुक्त (औषध), परिमंडल-5 कार्यालय ने प्रथम स्थान हासिल किया था, लेकिन एक वर्ष से अधिक समय बीतने के बावजूद उसे प्रमाणपत्र नहीं मिला। इसके विपरीत प्रथम स्थान से संबंधित प्रमाणपत्र FDA के अन्न विभाग की सहायक आयुक्त अनुपमा पाटिल के नाम जारी होकर उनके हाथ पहुंचने का मामला सामने आया है। जिस अवधि में परिमंडल-5 ने यह उपलब्धि हासिल की थी, उस समय गणेश रोकड़े वहां सहायक आयुक्त (औषध) थे। वर्तमान में रोकड़े FDA मुख्यालय में सह आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं। इस मामले में FDA मुंबई मंडल के सह आयुक्त एवं कार्यालय प्रमुख द्वारा 5 मई 2026 को मुंबई शहर जिलाधिकारी, मुंबई उपनगर जिलाधिकारी और FDA आयुक्त को भेजा गया पत्र महत्वपूर्ण है। पत्र में उल्लेख है कि 100 दिवसीय कार्यालयीन सुधार अभियान के दूसरे चरण में जिला स्तरीय कार्यालय समूह के अंतर्गत सहायक आयुक्त(औषध), परिमंडल-5 कार्यालय को प्रथम क्रमांक प्राप्त हुआ था। पत्र में संबंधित प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है।


हकदार परिमंडल-5, प्रमाणपत्र अनुपमा पाटिल के नाम
मामला इसलिए पेचीदा हो गया है क्योंकि FDA मुंबई मंडल के अन्न विभाग की सहायक आयुक्त अनुपमा पाटिल ने मुंबई शहर की जिलाधिकारी आंचल सूद गोयल के हाथों उक्त प्रमाणपत्र प्राप्त किया। प्रमाणपत्र लेते हुए उनकी तस्वीर भी सामने आई और 5 मई 2026 को सिटी कलेक्टर के आधिकारिक X अकाउंट पर कार्यक्रम से संबंधित तस्वीर साझा की गई थी। प्रमाणपत्र पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्रियों के हस्ताक्षर हैं। संबंधित प्रमाणपत्र 15 अगस्त 2025 को वितरण के लिए जिलाधिकारी कार्यालय को सौंपे जाने की बात सामने आई है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि परिमंडल-5 को प्रथम स्थान मिलने के बावजूद अन्न विभाग की सहायक आयुक्त अनुपमा पाटिल का नाम प्रमाणपत्र पर किस आधार पर दर्ज हुआ? उनका नाम किस कार्यालय अथवा अधिकारी ने भेजा और किस स्तर पर उसका सत्यापन किया गया? मूल रिकॉर्ड की जांच से ही स्पष्ट हो सकता है कि यह प्रशासनिक त्रुटि थी या प्रमाणपत्र तैयार करने और वितरण की प्रक्रिया में किसी स्तर पर अनियमितता हुई।
जिलाधिकारी कार्यालय की सत्यापन प्रक्रिया पर भी सवाल
जिलाधिकारी आंचल सूद गोयल द्वारा अनुपमा पाटिल को प्रमाणपत्र दिए जाने के कारण वितरण से पहले हुई सत्यापन प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि प्रमाणपत्र सौंपने से पहले विजेता कार्यालय की मूल सूची और FDA के रिकॉर्ड का मिलान किया गया था या नहीं। अनुपमा पाटिल को कार्यक्रम की सूचना किस माध्यम से मिली और उन्हें प्रमाणपत्र लेने के लिए किस आधार पर बुलाया गया।
5 मई 2026 को ही FDA ने मांगा अपना प्रमाणपत्र
घटनाक्रम में 5 मई की तारीख भी महत्वपूर्ण है। इसी दिन सिटी कलेक्टर के आधिकारिक X अकाउंट पर प्रमाणपत्र वितरण कार्यक्रम की तस्वीर सामने आई और FDA मुंबई मंडल के सह आयुक्त एवं कार्यालय प्रमुख ने जिलाधिकारी तथा FDA आयुक्त को पत्र लिखकर परिमंडल-5 को प्रथम स्थान का प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। हालांकि FDA के पत्र में अनुपमा पाटिल का उल्लेख नहीं है। इसलिए इसे उनके खिलाफ विभागीय शिकायत नहीं कहा जा सकता। पत्र केवल परिमंडल-5 को मिले प्रथम क्रमांक और उससे संबंधित प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने के विषय में है। इसके बावजूद चार महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी पत्र का जवाब नहीं मिलने की बात सामने आ रही है।
तत्कालीन FDA आयुक्त ने जांच क्यों नहीं कराई?
मुंबई मंडल द्वारा लिखित रूप से प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का मामला उठाए जाने के बाद तत्कालीन FDA आयुक्त के स्तर पर क्या कार्रवाई हुई, यह भी स्पष्ट नहीं है। यदि प्रमाणपत्र पर नाम दर्ज होने में गलती हुई थी तो उसमें सुधार क्यों नहीं किया गया? और यदि अनुपमा पाटिल का नाम किसी वैध प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत दर्ज हुआ था तो उससे संबंधित रिकॉर्ड सामने आना चाहिए।
क्या तुकाराम मुंढे कराएंगे जांच?
अब इस पूरे मामले में निगाहें FDA आयुक्त तुकाराम मुंढे पर हैं। उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वे 100 दिवसीय कार्यालयीन सुधार कार्यक्रम के मूल्यांकन से जुड़े भारतीय गुणवत्ता परिषद (Quality Council of India-QCI) के रिकॉर्ड और FDA के उपलब्ध अभिलेखों की जांच कराएं। जांच में यह स्पष्ट किया जाए कि QCI के मूल्यांकन रिकॉर्ड में प्रथम स्थान किस कार्यालय को दिया गया था, प्रमाणपत्र के लिए किस अधिकारी का नाम भेजा गया और वह नाम किस स्तर पर बदलकर या दर्ज होकर जिलाधिकारी तक पहुंचा।
‘काम करे बंदर, मलाई खाए मदारी’ जैसी स्थिति
पूरे घटनाक्रम में ‘काम करे बंदर, मलाई खाए मदारी’ वाली कहावत चरितार्थ होती दिखाई देती है। रिकॉर्ड में उपलब्धि औषध विभाग के परिमंडल-5 की है, जबकि उससे संबंधित प्रमाणपत्र अन्न विभाग की अधिकारी के नाम सामने आया। मुख्यमंत्री के 100 दिवसीय कार्यालयीन सुधार कार्यक्रम से जुड़े सरकारी सम्मान में यह विरोधाभास सामान्य लिपिकीय भूल है या इसके पीछे कोई दूसरी वजह, इसका फैसला निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए। इस मामले में जिलाधिकारी कार्यालय का पक्ष जानने के लिए संवाददाता द्वारा जिलाधिकारी आंचल सूद गोयल से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनकी ओर से जवाब नहीं मिल सका। अब प्रशासन को मुख्य रूप से यह स्पष्ट करना है कि अनुपमा पाटिल का नाम प्रमाणपत्र के लिए किसने भेजा, उसका सत्यापन किसने किया और प्रथम स्थान हासिल करने वाले परिमंडल-5 को एक वर्ष से अधिक समय बाद भी उसका प्रमाणपत्र क्यों नहीं मिला?

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