
मुंबई। आईआईटी बॉम्बे के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संजय महाजनी ने मंगलवार को कैंपस में विकसित एक अभिनव और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा मॉडल की जानकारी दी है, जिसमें सूखे पत्तों और टहनियों जैसे जैविक कचरे का उपयोग ईंधन के रूप में किया जा रहा है। प्रोफेसर महाजनी के अनुसार, आईआईटी बॉम्बे परिसर में बड़े पैमाने पर हरित क्षेत्र होने के कारण हर दिन काफी मात्रा में सूखे पत्ते और टहनियां गिरती हैं। सामान्यतः इन्हें जलाने से ऊर्जा तो मिलती है, लेकिन इसके साथ ही भारी मात्रा में प्रदूषण, खासकर पार्टिकुलेट मैटर (धूल कण) का उत्सर्जन होता है। उन्होंने बताया कि इसी समस्या का समाधान खोजते हुए संस्थान ने इस आईआईटी बॉम्बे का अनोखा प्रयोग: सूखे पत्तों से बन रही स्वच्छ ऊर्जा, कैंटीन में हो रहा उपयोगकचरे में निहित ऊर्जा का उपयोग करने का निर्णय लिया। इसके लिए पहले सूखे पत्तों और टहनियों को प्रोसेस कर पेलेट (छोटे ठोस ईंधन ब्लॉक) में बदला जाता है। इसके बाद इन पेलेट्स को विशेष रूप से डिजाइन किए गए गैसीफायर यूनिट में डाला जाता है। गैसीफिकेशन प्रक्रिया के दौरान इन पेलेट्स से “प्रोड्यूसर गैस” तैयार होती है, जिसमें मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन होते हैं। इस गैस को तुरंत नियंत्रित तरीके से जलाया जाता है, जिससे बहुत कम प्रदूषण होता है।
प्रोफेसर महाजनी ने बताया कि इस प्रक्रिया से उत्पन्न ऊर्जा का उपयोग पानी को भाप (स्टीम) में बदलने के लिए किया जाता है। यह भाप सीधे आईआईटी बॉम्बे के कैंपस स्थित कैंटीन तक पहुंचाई जाती है, जहां इसका उपयोग भोजन पकाने और अन्य थर्मल कार्यों में किया जाता है।
उन्होंने कहा कि इस तकनीक को विकसित करना आसान नहीं था और इसके लिए लंबे समय तक शोध और प्रयोग किए गए। यह पहल न केवल कचरे के प्रभावी प्रबंधन का उदाहरण है, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।




