
मुंबई। सायन-कोलीवाड़ा इलाके में स्थित गुरु तेग बहादुर नगर (जीटीबी नगर) के ग्रुप रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट को लेकर को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटियों ने महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (म्हाड़ा) और कीमिडटाउन डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ तीन-तरफ़ा डेवलपमेंट एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य आज़ादी के बाद पाकिस्तान से भारत आए लगभग 1,200 सिंधी परिवारों का पुनर्विकास कर उन्हें आधुनिक आवास उपलब्ध कराना है। यह समझौता 5 मार्च को मुंबई में म्हाड़ा मुख्यालय में मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजीव जायसवाल, मुंबई मण्डल के मुख्य अधिकारी मिलिंद बोरिकर और कीस्टोन रियलटर्स (रुस्तमजी ग्रुप) के मैनेजिंग डायरेक्टर बोमन ईरानी की मौजूदगी में साइन किया गया। रुस्तमजी ग्रुप के अनुसार यह रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट करीब 11.54 एकड़ (46,731.15 वर्ग मीटर) क्षेत्र में फैला हुआ है। इस बड़े प्रोजेक्ट से 1,200 से अधिक सदस्यों को लाभ मिलने की उम्मीद है और लगभग 20.7 लाख वर्ग फीट बिक्री योग्य क्षेत्र तैयार होगा। कंपनी के प्रबंध निदेशक बोमन ईरानी ने कहा कि म्हाड़ा के साथ डेवलपमेंट एग्रीमेंट और अलग कंस्ट्रक्शन व डेवलपमेंट एग्रीमेंट पर औपचारिक हस्ताक्षर होना इस परिवर्तनकारी परियोजना की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। उन्होंने कहा कि कंपनी सभी हितधारकों के साथ मिलकर काम करेगी, ताकि जीटीबी नगर के मौजूदा निवासियों को जल्द से जल्द उनके नए घर मिल सकें और यह क्षेत्र एक आधुनिक व समावेशी कम्युनिटी के रूप में विकसित हो सके। म्हाड़ा के अनुसार यह निजी भूमि पर लागू होने वाला उसका पहला रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट होगा। इससे पहले जुलाई 2025 में म्हाड़ा ने जीटीबी नगर के पुनर्विकास के लिए रुस्तमजी ग्रुप को डेवलपर के रूप में नियुक्त करने की घोषणा की थी। परियोजना के तहत लगभग 1,200 पात्र लाभार्थियों के लिए 39 से 48 मंज़िला तीन आधुनिक आवासीय टावर बनाए जाएंगे। डेवलपमेंट कंट्रोल रेगुलेशन 33(9) के अनुसार कम से कम 4.5 एफएसआई (फंजिबल एफएसआई सहित) उपलब्ध कराया जाएगा। प्रत्येक पात्र लाभार्थी को आधुनिक सुविधाओं से युक्त 635 वर्ग फुट का एक मुफ्त सेल्फ-कंटेन्ड आवासीय यूनिट दिया जाएगा। परियोजना को एक गेटेड कम्युनिटी के रूप में विकसित किया जाएगा, जिसमें मल्टी-लेवल बेसमेंट और पोडियम पार्किंग की व्यवस्था होगी। सक्षम प्राधिकरण से कमेंसमेंट सर्टिफिकेट मिलने के बाद सभी पात्र निवासियों को प्रति माह 20,000 रुपये का किराया मुआवज़ा भी दिया जाएगा। इसके अलावा परियोजना पूर्ण होने के बाद पाँच वर्षों तक भवनों का रखरखाव और प्रबंधन भी म्हाड़ा द्वारा किया जाएगा।
शरणार्थी परिवारों का इतिहास
साल 1957 से महाराष्ट्र सरकार ने पाकिस्तान से आए 1,200 से अधिक शरणार्थी परिवारों को उनके लिए विशेष रूप से बनाई गई 25 इमारतों में बसाया था। उस समय प्रत्येक अपार्टमेंट की कीमत लगभग 5,380 रुपये थी और प्रति वर्ग फुट दर करीब 14 से 15 रुपये थी। आज उसी इलाके में संपत्ति की कीमत लगभग 20,000 से 30,000 रुपये प्रति वर्ग फुट के बीच पहुँच चुकी है। भारत विभाजन के बाद केंद्र सरकार ने हजारों हिंदू पंजाबी, सिख पंजाबी और सिंधी शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए देशभर में कॉलोनियां बसाईं। महाराष्ट्र में मुंबई सहित 30 से अधिक ऐसी कॉलोनियां विकसित की गईं। इनमें से अधिकांश परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांतों से आए थे, जिन्हें विस्थापित व्यक्ति (मुआवज़ा और पुनर्वास) अधिनियम 1954 के तहत आवास उपलब्ध कराया गया था।




