
केरलम की धरती फिर चुनाव से हैं सजी,
नारियल की ‘छांव’ में राजनीति भी हंसी।
समुद्र की लहरों संग उठती जन-आवाज़,
हर मन में गूंज रहा हैं लोकतंत्र का साज़।
इन झंडों के ‘रंगों’ में समाई हैं उम्मीदें कई,
किसी की लाल-किसी की हरी-सुनेरी नई।
कदम-कदम पे वादों की बारिश हैं हो रही,
हर गली में बहस की चिंगारी हैं जल रही।
चेहरों पर मुस्कान और भीतर सवाल गहरे,
कौन निभाएगा सपने व कौन रहेगा ठहरे?
यहाँ पर भीड़ में भी हर ‘मतदाता’ खास है,
उसकी उंगली में ही ‘भविष्य’ की आस है।
ना कोई दुश्मन यहाँ, ना कोई यहाँ पराया,
मतभेदों के बाद भी हैं ‘एकता’ का साया।
यहाँ चुनाव का पर्व है, जश्न है विश्वास का,
जनता ही मालिक इस देश की सांस का।
जब लगे स्याही इस उंगली पर हल्की-सी,
तब लिखेगी इबारत, कहानी एक नई-सी।
ये ‘केरलम’ की मिट्टी फिर कहेगी शान से,
“जनता की जीत है, चुनाव के मैदान से।”
– संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)




