Sunday, April 5, 2026
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संपादकीय: भारतीय राजनीति का बदलता चेहरा!

भारत में लगता है झूठ ही राजनीति का पर्याय बन चुका है। बीजेपी का शायद ही कोई नेता हो जो झूठ के अलावा कभी सच बोलता हो। जिस प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव होते हैं, वहां बांग्लादेशी घुसपैठिए होने, प्रदेश सरकार और विपक्ष द्वारा उन्हें बसाकर संरक्षण देने के आरोप लगाए जाते हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह सहित कई नेता इन मुद्दों को चुनावी मंचों से बार-बार उठाते हैं। बिहार चुनाव में बांग्लादेशी होने का दुष्प्रचार किया गया, जिसे चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में गलत बताया कि बिहार में एक भी विदेशी नहीं है। अब असम और पश्चिम बंगाल में भी यही मुद्दा दोहराया जा रहा है। प्रधानमंत्री और अन्य नेता सत्ता में आने पर घुसपैठियों को बाहर निकालने के वादे कर रहे हैं। असम में हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भी इसी तरह की राजनीति देखने को मिलती है। आरोप यह भी है कि बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी मानकर कार्रवाई की गई। अब फिर वही दावे किए जा रहे हैं कि सत्ता में आने पर घुसपैठियों को बाहर निकाला जाएगा, जबकि संविधान हर नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में बसने और रोजगार करने का अधिकार देता है। इसी तरह 500 रुपये में रसोई गैस सिलेंडर देने का वादा पहले राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा और छत्तीसगढ़ में किया गया और अब असम व बंगाल में दोहराया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि पहले किए गए वादे क्यों पूरे नहीं हुए। ईरान पर अमेरिका-इजरायल हमले के बाद रसोई गैस सिलेंडर के दाम बढ़े हैं और आशंका जताई जा रही है कि चुनावों के बाद कीमतें और बढ़ सकती हैं। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति और उससे जुड़े आर्थिक हितों पर भी सवाल उठते हैं। बिहार में एथेनॉल फैक्ट्रियों के वादे पर किसानों को मक्का बोने के लिए प्रेरित किया गया, लेकिन फैक्ट्रियां नहीं खुलीं, जिससे किसान संकट में आ गए। असम में भी बड़े पैमाने पर जमीन पूंजीपतियों को दिए जाने के आरोप हैं। सरकारी संसाधनों के निजीकरण को लेकर भी बहस जारी है कि क्या इससे सरकार की भूमिका कमजोर हो रही है।
राजनीति में बढ़ता ध्रुवीकरण भी एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। आरोप हैं कि जनता को धर्म, जाति और वर्ग के आधार पर बांटा जा रहा है—पहले हिंदू-मुस्लिम, फिर एससी-एसटी, ओबीसी और सवर्ण के बीच विभाजन की राजनीति की जा रही है। इससे समाज में तनाव बढ़ता है और असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। राजनीतिक दलों के भीतर भी असहमति के लिए जगह कम होती दिखती है। वरुण गांधी और मेनका गांधी को टिकट न मिलना, राहुल गांधी की संसद सदस्यता खत्म होना जैसे मुद्दे इस बहस को और गहरा करते हैं। वहीं अरविंद केजरीवाल पर भी आरोप लगते हैं कि वे भी अब उसी राजनीतिक ढांचे का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जहां जनहित के मुद्दे उठाने वालों को हाशिये पर डाला जाता है। आज के संदर्भ में अटल बिहारी वाजपेयी का स्मरण स्वाभाविक है। उन्होंने कहा था कि सरकारें आएंगी-जाएंगी, लेकिन लोकतंत्र जिंदा रहना चाहिए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि जब सत्ता में विपक्ष के प्रति नफरत और उसे खत्म करने की इच्छा बढ़ जाती है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक होता है। आज आलोचकों का मानना है कि बिना ठोस प्रमाण के विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई, संस्थाओं जैसे सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल, और संसद में बहस की कमी लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि यह सख्त शासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवश्यक कदम हैं। अंततः लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बना रहे, संस्थाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष रहें, और जनता जागरूक होकर अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछती रहे।

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