Saturday, February 14, 2026
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने 15 वर्षीय रेप पीड़िता को गर्भपात की अनुमति दी, कहा — गर्भ जारी रखना मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को एक 15 वर्षीय रेप पीड़िता को गर्भपात (एमटीपी) की अनुमति दी, जिसकी बौद्धिक क्षमता “बॉर्डरलाइन इंटेलेक्चुअल फंक्शनिंग” (आईक्यू 80) श्रेणी में आती है। अदालत ने कहा कि गर्भ जारी रखना उसके लिए “बेहद कष्टदायक” होगा और उसकी मानसिक सेहत पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। जस्टिस रेवती मोहिते-डेरे और जस्टिस संदेश पाटिल की खंडपीठ ने यह आदेश लड़की के पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। 15 वर्ष 7 माह की यह लड़की अपने पड़ोसी द्वारा किए गए यौन शोषण के बाद गर्भवती हुई थी और फिलहाल 27 सप्ताह की गर्भवती थी। पीड़िता दसवीं कक्षा की छात्रा है और मार्च 2026 में बोर्ड परीक्षा देने वाली थी। 31 अक्टूबर को अदालत ने मामला सर जेजे अस्पताल के मेडिकल बोर्ड को भेजा था। बोर्ड ने 6 नवंबर को अपनी रिपोर्ट में बताया कि लड़की नाबालिग है, और उसमें कोई गंभीर जन्मजात असामान्यता नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि “कानूनी रूप से 24 सप्ताह के बाद गर्भपात की अनुमति देने का अधिकार मेडिकल बोर्ड को नहीं है, लेकिन यदि न्यायालय को लगता है कि गर्भ जारी रखना याचिकाकर्ता के लिए अत्यधिक पीड़ा का कारण बनेगा, तो अदालत इस पर विचार कर सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञों की राय
सर जेजे अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. मुजाहिद शेख ने कोर्ट को बताया कि लड़की “बच्चे की भावनात्मक, आर्थिक और सामाजिक रूप से देखभाल करने की स्थिति में नहीं है।” उन्होंने चेतावनी दी कि गर्भ जारी रखने से “डिप्रेशन, एंग्जायटी, पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस” जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ेगा और उसकी मानसिक प्रगति रुक सकती है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सुश्री ज़ैनब खान ने कहा कि बॉर्डरलाइन इंटेलेक्चुअल फंक्शनिंग वाले बच्चों की “मानसिक प्रोसेसिंग धीमी होती है और उनके निर्णय लेने, योजना बनाने और समस्या सुलझाने की क्षमता सीमित होती है। पीड़िता के माता-पिता, जो मजदूर हैं, ने गर्भपात के लिए अपनी सहमति वाले हलफनामे अदालत में दायर किए। अदालत ने आदेश दिया कि गर्भपात की प्रक्रिया सर जेजे अस्पताल में “लड़की की सुरक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता” देते हुए जल्द से जल्द की जाए। साथ ही, उसे “प्रक्रिया से पहले और बाद में” मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसलिंग) प्रदान करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बच्चा जीवित जन्म लेता है, तो अस्पताल को राज्य के खर्च पर उसे इंटेंसिव केयर में रखना होगा और क्रिमिनल ट्रायल के लिए डीएनए सैंपल सुरक्षित रखना होगा। साथ ही, न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया कि पीड़िता को ‘मनोधार्य योजना’ के तहत अंतरिम मुआवज़ा “शीघ्र” प्रदान किया जाए। इस फैसले को अदालत ने “बालिकाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक मानवीय कदम” बताया।

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