
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सोमवार को मराठा समुदाय के सदस्यों को आरक्षण के लिए कुनबी जाति प्रमाण पत्र जारी करने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली पांच याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। इन याचिकाओं को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के संगठन- कुनबी सेना, महाराष्ट्र माली समाज महासंघ, अहीर सुवर्णकार समाज संस्था, सदानंद मंडलिक और महाराष्ट्र नाभिक महामंडलने दायर किया था। उनका दावा है कि मराठा समुदाय को कुनबी जाति प्रमाण पत्र जारी करने से उन्हें ओबीसी श्रेणी में शामिल कर दिया जाएगा, जिससे अन्य ओबीसी समूहों के लिए आरक्षण कोटा प्रभावित होगा। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सरकारी प्रस्ताव तीन जातियों- कुनबी, कुनबी मराठा और मराठा कुनबी के प्रमाण पत्र जारी करने के आधार और मानदंड बदलता है, जो अस्पष्ट और भ्रामक है और इससे समाज में अराजकता फैल सकती है। यह मामला जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस संदेश पाटिल की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आया था, लेकिन जस्टिस पाटिल ने कहा कि वे इस पर सुनवाई नहीं कर सकते, जिसके बाद बेंच ने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया। अब यह मामला मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम अंखड़ की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए जाएगा। महाराष्ट्र सरकार ने 2 सितंबर 2025 को GR जारी किया था, जिसमें मराठा समुदाय के पात्र सदस्यों को कुनबी जाति प्रमाण पत्र जारी करने का निर्णय लिया गया। यह फैसला 29 अगस्त से मनोज जरांगे द्वारा दक्षिण मुंबई के आजाद मैदान में पांच दिनों तक अनशन और प्रदर्शन के बाद आया था, जिसके कारण शहर में गतिरोध उत्पन्न हुआ था। इस जीआर के तहत मराठा समुदाय के सदस्य अपने दस्तावेज प्रस्तुत कर प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं और प्रमाण पत्र मिलने के बाद ओबीसी श्रेणी में आरक्षण का दावा कर सकते हैं। इस विवाद से राज्य में मराठा–कुनबी प्रमाण पत्र मुद्दा संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक दृष्टि से गहरा हो गया है।




